पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
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| (२० सितम्बर १९११ - ०२ जून १९९०) |
संपूर्ण जगत के कल्याण के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वाले
मनीषियों में आचार्य श्रीराम शर्मा का भी नाम शुमार है। सतत कर्मयोग और समर्पण को
ही वे सत्य की खोज मानते थे। बहुत छोटी उम्र से ही वे समाज में इंसान-इंसान के बीच
भेद को लेकर व्यथित रहते थे। कम उम्र में ही आध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि हो
गई थी। पं. मदन मोहन मालवीय ने उन्हें यज्ञोपवित और गायत्री मंत्र से दीक्षित किया
था जिसके बाद उन्होंने अपने जीवन को इस शक्तिशाली मंत्र के अनुसंधान में समर्पित
कर दिया। एक संपन्न परिवार में जन्में आचार्य जी आध्यात्मिक संपदा को ही असली
संपत्ति मानते थे। अपने शिष्यों को उन्होंने आध्यात्म की शक्ति के बारे में बताते
हुए कई बार अपना उदाहरण देते हुए बताया कि यदि अपने परिवार और अपनी संपदा तक ही
उनका जीवन सीमित रहता तो कभी गायत्री परिवार जैसा बड़ा लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता।
आचार्य श्री प्रज्ञा जागरण को ही आज का योग मानते थे। उनका कहना था भौतिक जगत के
विकास के साथ-साथ प्रदूषण और अविवेक का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। प्रदूषण सिर्फ
बाहर ही नहीं है, हमारे विचार और संस्कार भी दूषित होते जा रहे हैं। ऐसे समय में
आध्यात्मिक जागरण की आवश्यकता अधिक है। प्रज्ञा जागरण के साथ ही ईश्वर स्वयं सत्य
की खोज का मार्ग प्रशस्त करन लगते हैं। वेदों और प्राचीन ग्रंथों के वैज्ञानिक
दृष्टिकोण से किए गए उनके टीका बहुत लोकप्रिय हुए। उनका मानना था कि सिर्फ किताबों
को पढ़ने या व्याख्यानों को सुनने भर से आध्यात्मिक जागरण नहीं होता है। वे हर एक
से अपनी शक्ति को पहचानने और जीवन को महत्वपूर्ण कार्यों में लगाने पर जोर देते
रहे।
ब्राह्मण
परिवार में जन्में आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपनी सत्य की खोज में जाना कि कोई
ब्राह्मण पैदा नहीं होता उसे ब्राह्मण बनना होता है। उनकी इस बात का जाति से कोई
लेना देना नहीं था। वेदों आदि में ब्राह्मण शब्द की महिमा को समझाते हुए वे ये
समझाना चाहते थे कि ब्राह्मण वही है जो सत्य की खोज कर लेता है। अपनी क्षूद्र
वासानओं और अपने मोह से बनाए संबंधों के लिए जीवन बिता देने को वे एक महत्वपूर्ण
और कीमती जीवन को बर्बाद कर देने वाला मानते थे। आजीवन कर्मयोगी रहे आचार्य
श्रीराम शर्मा ने अपने शिष्यों को भी एक ही सिद्धांत कि सतत शिक्षा दी। बोओ और
काटो। वे मानते थे कि आध्यात्म का स्वांग करने या झूठे कर्मकांडों से सत्य की
प्राप्ति नहीं होती है। सत्य को प्राप्त करने के लिए अपने कर्मों के बीज बोने
पड़ते हैं। समय, श्रम, ज्ञान और संपदा के बीज बोने पर उनका जोर था। हमें मिली एक
एक श्वांस महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए है। अपने प्रत्येक पल का सदुपयोग ही
समय के बीज का सही रोपण है। वे सोने, खाने एवं अन्य नित्यकर्मों में लगने वाले
अपने समय के लिए भी क्षमा मांगते हुए कहते थे कि ये समय मैंने अपने लिए खर्च किया
जो मुझे समय की बर्बादी लगती है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मानवमात्र के कल्याण
केकी लिए उन्होंने अपने जीवन को किस तरह
समर्पित कर रखा था। अखंड ज्योति जैसी समाज सुधार की पत्रिका या उनके द्वारा किया
गया वेदों का भाष्य हो, इस सबके लिए उन्होंने कठिन परिश्रम किया। अपने जीवन के
अंतिम समय तक वे देश भर का भ्रमण करते रहे, शिष्यों को व्याख्यान देते रहे। ज्ञान
का बीज तभी रोपा जा सकता है जब बुद्धि पर हमारा नियंत्रण हो। अभीष्ट कार्यों सिद्धि
और अनिष्ट कार्यों से दूरी ही बुद्धि की शक्ति है। मजबूत इच्छाशक्ति इस ज्ञान का
पैमाना है। जिनमें जनकल्याण की भावना है, आत्मशोधन का सपना है वे ही बुद्धिमान है।
आचार्य जी के पास पिता की संपत्ति थी लेकिन उन्होंने संपत्ति का मोह न कर अपनी
संपदा का बीज मानव कल्याण के लिए बो दिया। कर्मयोग से सत्य की प्राप्ति के लिए
उन्होंने एक सरह सिद्धांत अपने शिष्यों के समक्ष रखा। वे कहते थे ज्वार, बाजरे या
गेंहू का एक बीज बोते हैं तो सैंकड़ों बीज मिलते हैं। इसी तरह समय, श्रम, बुद्धि
और संपदा के बीज को बोने से सैकड़ों बीज फल रूप मिलते हैं। अपने जीवन को आदर्श के
रूप में बोने से आप करोड़ों जीवन कैसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर कर सकते हैं
का भी आचार्य जी एक बड़ा उदाहरण रहे हैं। सत्य की खोज करने वालों के लिए उनका
निर्देश बहुत स्पष्ट था, आप के जीवन में यदि क्षूद्र वासानाएं और इच्छाएं हैं तो
ये जीवन व्यर्थ ही गंवा रहे हैं। सत्य पाना है तो समर्पण का भाव होना चाहिए। विश्व
और मानव मात्र में ही ईश्वर के विराट स्वरूप को देखकर समर्पण करना ही सत्य की खोज
का मार्ग है। आध्यात्म के पथ में असफलता का प्रश्न ही नहीं उठता है और आचार्य जी
के जीवन से भी ये स्पष्ट हो जाता है। वे प्रत्येक श्वांस के साथ जीवन के लक्ष्यों
को उच्चतर स्तर पर ले जाने पर जोर देते थे। जिस तरह कच्ची धातु को तपाकर उसमें से
धातु को निकाला जाता है ठीक उसी तरह से तप से मन और विचारों को भी शुद्ध किया जाता
है। आतंरिक स्वच्छता ही सत्य की खोज के लिए एक उपजाऊ भूमि देते है। जब प्रज्ञा
जागृत होती है और आतंरिक भूमि उर्वरा होती है तो सत्य की खोज सहजता से हो जाती है।
जल, अक्षत, धूप, फूल, नैवेद्य को वे दयालू प्रवृत्ति, अर्जित धन का मानव कल्याम
में सदुपयोग, चिंतन और कर्म की सुगंध, मन की कोमलता और व्यवहार और वाणी की मिठास
के रूप में निरूपित करते थे। वे मानते थे कि इस पंचोपचार से आज की देवी प्रज्ञा का
पूजन ही सत्य की खोज है।

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