शनिवार, 4 अप्रैल 2015
सत्य की खोजः पुस्तक समीक्षाः दिवाकर विक्रम सिंह (Satya Ki Khoj, Book Review)
वर्तमान भागदौड़ भरी जिंदगी में किसे यह फुर्सत है कि वह खुद को जाने और सत्य का साक्षात्कार करे। वास्तव में 'सत्य की खोज' या उसका अन्वेषण भारतीय मनीषा की यहां के लोगों को अनुपम भेंट है जिसे हजारों वर्षों से तत्ववेत्ता हमें देते रहे हैं। गीता में तो उद्घोष है, 'नासते विद्यते भावो, ना भावो विद्यते सत:'। अर्थात सत् का अभाव नहीं है और असत् का कोई वजूद ही नहीं। जब सत् ही वास्तविकता है तो मानव समाज को असत् का ही भान क्यों होता है, यह अहम यक्ष प्रश्न है जो सभी जिज्ञासुओं के मन में उठता है। इन्हीं प्रश्नों का समाधान खोजने का एक प्रयास है, 'सत्य की खोज' में। डॉ. प्रवीण तिवारी द्वारा लिखित उक्त पुस्तक की उपादेयता और प्रासंगिकता इसलिए भी है क्योंकि इस नव भौतिकवादी समयकाल में हम इस तरह का जीवन जी रहे हैं जहां हमारी सोच यंत्रवत हो गई है। मानव जीवन के वास्तविक मूल्य जैसे बहुत पीछे छूट गए हैं। लेकिन हमारा भी विवेक कभी-कभी जगता है और जब हम अपने आप से दूर भागने की बजाय खुद से सवाल करने लगते हैं तो मन में प्रश्न उठने लगते हैं कि आखिर सत्य क्या है। तो जनाब, अब 'सत्य की खोज' नामक पुस्तक से सत्संग के लिए तैयार हो जाइए। आप जितना इस पुस्तक में डूबेंगे, व्यावहारिक धरातल पर सत्य को पाने की कोशिशें तेज होती जाएंगी। पुस्तक के प्रारंभ में ही जब लेखक इस बात का जिक्र करते हैं कि जैसे ही आप वर्तमान के प्रति सजग होते हैं, एक नवीन और बेहतर दुनिया आपके सामने होती है, इसे पढ़कर आप की जिज्ञासा और सजगता बढ़ जाती है। वास्तव में सत्य को खोजने के लिए संवेदनशील होना पड़ता है इसलिए उसके प्रयास के तहत लेखक यह बताने की कोशिश करते हैं कि सजगता एक बड़ी शर्त है। फिर सिलसिलेवार तरीके से बताया जाता है कि आखिर सत्य है क्या। लेखक के मुताबिक सत्य कहीं दूर नहीं है, आपके भीतर ही है। आप ही सत्य का स्वरूप हैं। असत् की मोटी चादर के नीचे कहीं सत्य की रोशनी दब जाती है। हम हमेशा उसके साथ रहते हैं लेकिन असत्य का आकर्षण हमें अपनी ओर खींचता रहता है। दुनिया में किसी भी मनुष्य को अगर सत्य मिला है तो वह एक ही जैसा है। सत्य का स्वरूप मेरे लिए कुछ है और आप के लिए कुछ और तो फिर वह सत्य रहा ही कहां। एक बात तो बहुत स्पष्ट है कि सत्य एक ही है और वह हम सबके लिए समान है। सत्य की खोज की आवश्यकता अनुभव करने के लिए पहले हम इन तीन प्रश्नों पर विचार करते हैं। आप ही सत्य हैं। ईश्वर भी सत्य ही है, सत्य के मार्गदर्शक, इसलिए सत्य की खोज के अभ्यास की जरूरत है। अभ्यास के लिए क्या जरूरी है, इसका भी जिक्र है अर्थात् सही अभ्यास, विश्राम का अभ्यास, विचारों को देखने का अभ्यास, सीखने का अभ्यास, आत्मबल का अभ्यास, व्यावहारिक ज्ञान का अभ्यास, एकाग्रता का अभ्यास, वर्तमान का अभ्यास, अपनेपन का अभ्यास, सतत् अभ्यास का अभ्यास। वास्तव में इनके माध्यम से सत्य घनीभूत होकर किसी भी जिज्ञासु के अंतर्मन में उतरने लगेगा। लेखक यहीं नहीं रुकता बल्कि सत्य की खोज में क्या बाधाएं हैं, इस पर भी प्रकाश डाला गया है। इसमें कहा गया है कि सत्य को पाने में रुकावट है- असत्य के प्रति हमारा आग्रह, अंधविश्वास, आदर्श, दिखावा, दुर्व्यसन, जलन, अपमान, सम्मान की चाह, 'क्या कहेंगे लोग' का भाव, अधिकार, विचारों का ढेर, विचलन, टालमटोल। इस पर हम कैसे विजय पा सकते है, इसका भी जिक्र पुस्तक में है। इसके लिए मन, शरीर, संघर्ष, तप, कल्पना, जिज्ञासा, संवाद, कृतज्ञता के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। इसके उपरांत भारतीय चिंतन धारा की अप्रतिम भेंट गीता के माध्यम से सत्य की खोज की जरूरत और उसकी सार्थकता बताई गई है और इसके लिए जिन तत्वदर्शियों ने साधना के माध्यम से आत्मबोध किया, उनके बारे में जिक्र है। इस तरह 'सत्य की खोज' पुस्तक के माध्यम से आत्मदर्शन के व्यावहारिक पहलुओं को छूते हुए लेखक ने एक ऐसी माला पिरो दी है, जिसका अध्ययन जीवन बदल सकती है।
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