दिन भर की भागदौड़
के बाद जब हम थक कर चूर हो जाते हैं तो बस यही मन करता है कि अब बिस्तर पर गिरते
ही नींद आ जाए। होता भी यही है और जब नींद खुलती है तो लगता है थकान अब भी बाकी
है। फिर वहीं रोजमर्रा की जिंदगी और फिर वहीं थकान। फिर आता है छुट्टी का दिन, लेकिन
ये क्या, छुट्टी के दिन तो हमारे इतने सारे काम पहले से ही पेंडिंग पड़े हैं
उन्हें कब निपटाएंगे? और फिर इन कामों को करें या ना करें लेकिन सोच सोच कर ही
थकान इतनी ज्यादा हो जाती है कि चिढ़ होने लगती है। लगभग सभी की कहानी मिलती जुलती
होती है लेकिन कहानियों में एक फर्क भी देखने को मिलता है। कुछ लोग अपने जीवन में
नित नई ऊर्जा भरते जाते हैं, आगे बढ़ते जाते हैं, तो कुछ लोग लगातार थकते जाते हैं
और एक दिन इतना थक जाते हैं कि उनके जीवन से आनंद का रस ही खत्म हो जाता है।
उन्हें किसी काम में मजा ही नहीं आता। यहां तक की उन्हें कोई नई बात कह भर दी जाए
तो वो आगबबूला हो जाते हैं। इसकी वजह है शरीर की थकान से भी खतरनाक मन की थकान। चौंकिए
मत, जी हां ये सच है कि आपका मन भी थक जाता है और मन की ये थकान इतनी खतरनाक है कि
उसके बाद सिवाय अवसाद के और कुछ आपके जीवन में नहीं रह जाता। ये दुनिया वहीं है,
ये लोग वहीं हैं, ये कुदरत वही है, लेकिन इसके बावजूद आपके भीतर बहुत कुछ बदल रहा
है। ये बदलाव यदि सकारात्मक है तो आप जीवन के उच्चतम स्तर को पाएंगे और इसके उलट
ये बदलाव यदि नकारात्मक है तो एक दिन आप भी मन की थकान के उस आखिरी स्तर पर पहुंच
जाएंगे जिसे अवसाद कहते हैं। जैसे कभी न खत्म होने वाले आनंद का जिक्र मिलता है
वैसे ही कभी न खत्म होने वाले अवसाद, नीरसता और चिढ़ का भी अस्तित्व होता है।
आपको तय करना है कि
आप किस रास्ते चल रहे हैं और सच पूछिए तो इसे आप ही जान सकते हैं। दरअसल आप क्या
कर रहे हैं से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप किसी काम को किस मनोभाव के साथ कर रहे
हैं। यदि आप ईर्ष्या और थकान से भरकर किसी काम को करते हैं तो खुद को और थकाते
हैं। शरीर को आराम देने के लिए हम विश्राम जानते हैं। हम आखें बंद कर या कहीं
बैठकर या लेटकर शरीर की थकान दूर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जीवन में नीरसता
के लिए शारीरिक थकान बहुत कम जिम्मेदार होती है जबकी मन की थकान आपकी निराशा के
मूल में होती है। घर में जब कोई शादी समारोह या कोई बड़ा काम होता है तो सभी लोगों
में एक ऊर्जा आ जाती है। खास तौर पर घर की महिलाएं दिन रात जुटी रहती हैं। लेकिन
जैसे ही वो कार्यक्रम खत्म होता है वो पस्त हो जाते हैं। उनमें से कुछ बीमार हो
जाते हैं। कुछ दो तीन दिन तक सोते रहने की बातें करते हैं। ये आपके भी जीवन का
अनुभव रहा होगा कि जब आप किसी काम को पूरे रस के साथ करते हैं तो समय और थकान का
आभास ही नहीं रहता और जैसे ही उस काम की पूर्णता होती है आप बुरी तरह से थकान
महसूस करते हैं।
जीवन में यही रस
आपकी सकारात्मक ऊर्जा के मूल में है। क्यूंकि हम जीवन के अन्य कामों में अपने मन
की थकान से निराशा का अनुभव करते हैं इसीलिए थकान और अरुचि जीवन में घर करती जाती
है। आप किसी काम को रोज रोज करते हैं या किसी भी बात का दोहराव आपको कोल्हू के बैल
की भांति जीवन जीने का भी अनुभव देता है। दरअसल हम शारीरिक श्रम से जिस तरह
शारीरिक थकान का अनुभव करते हैं ठीक वैसे ही मन और मस्तिष्क के श्रम से हम मानसिक
थकान का अनुभव करते हैं। शारीरिक रूप से जिन कामों को बार बार करते हैं उनसे स्वभाविक
रूप से अरुचि होने लगती है। आप रोज रोज एक तरह की सब्जी नहीं खा सकते, आप रोज रोज
एक जैसा काम करने से होने वाली अरुचि से भी वाकिफ हैं, ये दोहराव हमारे जीवन में
नीरसता लाता है। अब जरा सोचिए एक जैसे विचारों को 24 घंटे सोचते रहने से हमारे मन
पर इस दोहराव के क्या नतीजे आते होंगे? जी हां मन की थकान और नीरसता की बड़ी वजह एक जैसे विचारों
के मकड़जाल में फंस कर रह जाना ही है। शरीर के विश्राम की तरह अव्वल तो आपको मन के
विश्राम की भी व्यवस्था करनी चाहिए। मन कुछ और नहीं आपके विचारों का पुलिंदा है।
इन विचारों को कुछ पलों के लिए विराम देकर आप चाहे तो अपने मन को शांत कर सकते
हैं। अपने विचारों को देखना स्वयं के स्वरूप पर ध्यान देना इसकी प्रारंभिक विधियां
हो सकती हैं। फिर ध्यान की ऐसी कई विधियां हैं जो आपको चित्त की वृत्तियों या आपके
विचारों को तेल धारावत चलना सिखाती हैं। आप यदि मन को विश्राम देना सीख लेते हैं
तो अपने जीवन से हमेशा हमेशा के नीरसता का नाश कर सकते हैं। नीरसता बाहर नहीं भीतर
हैं और इसी तरह रस भी बाहर नहीं भीतर ही है। जब तक रस की तलाश बाहर होती रहेगी,
भीतर की नीरसता ताकतवर बनी रहेगी। जब तक नीरसता है मन थका हुआ रहेगा और मन की ये
थकान आपकी हर थकान के मूल में है।
कल्पना जगत में रहकर
अपने वर्तमान से हटकर किसी अप्राप्त परिस्थिति का चिंतन आपको विचारों के इस दुहराव
तक ले जाता है। आपने अपने भीतर अपनी एक दुनिया बसाई है, एक ऐसा कल्पनाजगत जिसमें
आपने तमाम किरदार बना रखे हैं। कोई अच्छा है कोई बुरा है, कोई हितैषी है कोई
ईर्ष्यालू है तो किसी से आप ईर्ष्या करते हैं। कोई आप से कुछ चाहता है तो किसी से
आप कुछ चाहते हैं। आपकी इस फिल्म के जाने कितने किरदार हैं। इसी तरह आपने अच्छी बुरी
परिस्थितियों का भी खाका बना रखा है। मन की बात होगी तो शुभ परस्थितियां और मन की
नहीं हुई तो अशुभ। फिर अशुभ के भय की कल्पनाएं तो शुभ की प्राप्ति की कल्पनाएँ
शुरू हो जाती हैं। ये ऐसी प्रक्रिया है जो सतत आपके भीतर चल रही है। जिसने इस
प्रक्रिया को देखना सीख लिया और अगले चरण में इसके प्रति सतर्क होना सीख लिया,
उसने अपने मन को काबू करने की शुरूआत कर दी है। फिर वर्तमान के प्रति जागृति,
विचारों के प्रति सतर्कता और कुछ समय किया ध्यान का सतत अभ्यास स्वतः ही आपका आगे
का मार्ग प्रशस्त करता है।

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