बाबाओं की इस समाज
में क्या जरूरत है? बाबा हैं और उनके पीछे बहुत बड़ी भीड़ भी है। नेताओं
अभिनेताओं से कहीं ज्यादा बड़ी भीड़। बाबा कुछ भी करें लोग उनके पीछे होते हैं। जब
वो व्यवसाय में उतरते हैं तो बड़ी बड़ी कंपनियों के पसीने छूट जाते हैं। जब वो
राजनीति के अखाड़े में आते हैं तो उनके एक इशारे पर समीकरण बदल जाते हैं। नेता,
व्यवसायी या शोहरत और ताकत वाले लोग भी बाबाओं की शरण में दिखाई पड़ते हैं। ये तो
साफ है कि बाबाओं में कुछ तो बात होती है जो लोग उनसे बंधते चले जाते हैं। पुराने
संतों की बात करें तो उनका प्रभाव इतना जबरदस्त होता है कि उनके नाम पर धर्म
संप्रदाय भी बन जाते हैं। आज समाज के ताने बाने को देखें तो विज्ञान ने सुविधा के
साधन तो दिए हैं लेकिन सामाजिक ताना बाना आध्यात्मिक लोगों का ही दिया हुआ है।
इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सभी बाबाओं या संतों ने समाज को सही दिशा नहीं दिखाई
है। जहां कई सच्चे संत हुए तो कई ऐसे संत भी हुए जिन्होंने इस समाज को अंधविश्वास
भी दिया है। बाबाओं की तो समाज को हमेशा से जरूरत रही है और आगे भी रहेगी लेकिन
किसके पीछे चलना और किससे बचना की समझ तो समाज को खुद ही विकसित करनी होगी। अब
बाबाओं के पीछे चलने की वजहों पर विचार करते हैं। पहली वजह तो ये कि वो कोई ऐसी
दैवीय शक्तियां विकसित कर लेते हैं जो आम लोगों में नहीं होती। ये एक ऐसी मान्यता
है जो सामान्य बुद्धि के लगभग सभी लोगों में घर कर जाती है। दूसरी वजह है अपने
निजी जीवन का विकास।
पहली वजह में कुछ
सच्चाई है तो बहुत कुछ झूठी धारणाएं भी हैं। सच्चाई ये है कि सच्चे संत वीत राग या
वैराग्य को प्राप्त होते हैं। वे जीवन से भेद और इच्छाओं का अंत कर देते हैं।
अष्टांग योग से एक ऐसे चरित्र और जीवन का निर्माण करते हैं जो समाज के लिए एक
आदर्श प्रस्तुत करता है। वे मनुष्य जीवन के उत्थान और पतन को साक्षी भाव से देखते
हैं और इसीलिए उनकी दृष्टि अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं मे फंसे सामान्य मनुष्य से
ज्यादा तीव्र और प्रभावशाली होती है। जो राग द्वेष से मुक्त है वो भय से मुक्त है।
अपना कल्याण चाहने वाला हर मनुष्य भय के समूल नाश के लिए सच्चे संतों की शरण में
जाता है। संत का जीवन एक ऐसा आदर्श है जो उसमें ये प्रेरणा पैदा करता है कि हर
मनुष्य इसी तरह के शांत और उत्तम जीवन को प्राप्त कर सकता है। इस तरह के जीवन का
अर्थ ये नहीं कि सभी आश्रम बनाकर भगवा धारण कर लें बल्कि कोई भी कहीं भी जो कुछ भी
कर रहा है उसे वहीं करते हुए सत्य के गुणों का विकास अपने भीतर करने का साहस मिलता
है।
राजपाठ छोड़ने वाले
बुद्ध को जो जीवन मिला वही जीवन ताउम्र जुलाहे का काम करने वाले कबीर को मिला। वही
शांत जीवन क्रूर हत्यारे अंगुलीमाल को बुद्ध की शरण में आने से मिला। आज भी कई ऐसे
संत है जो सचमुच अपने जीवन से ऐसा आदर्श प्रस्तुत करते हैं। नाद ब्रह्म के परम
ज्ञानी स्वामी गंगाराम भी ऐसे विरले संत हैं जिनका अपना जीवन प्रेरणा से भरा है।
ऐसे ही आज के दौर के कई सच्चे संत आपको मिल जाएंगे। हमें तय करना है कि हम किन
गुणों का विकास करने के लिए, कैसा जीवन पाने के लिए इन संतों के पास जा रहे हैं।
यदि हम कभी न खत्म होने वाले सुख और शांति की तलाश में जा रहे हैं, यदि हम सत चित
आनंद की तलाश में जा रहे हैं तो वो हमें सच्चे संतों की शरण में हमेशा मिलेगा वो
चाहे सशरीर हमारे साथ हो या न हो। अब बात करते हैं बाबाओं के पीछे जाने वालों की
बड़ी तादाद की और ये ज्यादा गंभीर मसला है क्यूंकि यही अंधविश्वास और आस्था के बीच
की बारीक लकीर पार हो जाती है।
ज्यादातर लोग अपने
अभीष्ट कामों की सिद्धि के लिए बाबाओं के चक्कर लगाते हैं। इन लोगों के लालच का फायदा
उठाते हुए कई लोगों इनकी तुच्छ कामना पूर्ति के लिए कई स्वांग रच लेते हैं। ये
स्वांग धीरे धीरे लोगों में अंधविश्वास के रूप में घर कर जाते हैं। टोने टोटकों का
एक सिलसिला शुरू हो जाता है। कई लोगों को अजीबो गरीब लगने वाली सलाहें भी अपने
भाग्य परिवर्तन का तरीका महसूस होने लगती हैं। उनमें से कुछ के आजमाने के बाद यदि
कोई सकारात्मक परिणाम निकलता है तो बाकी आंखें बंद कर उसके पीछ चलने लगते हैं। ये
नियम है कि उत्थान पतन चलता रहेगा। अच्छे बुरे परिणाम दुनियावी बातों में आते रहते
हैं। किसी के जीवन में सतत सफलता या सतत असफलता नहीं होती। आंशिक सुख और आंशिक दुख
बना रहता है। हमारे अपने प्रयासों और विचार शक्ति से सुख या दुख का जीवन पर असर
पड़ता है। सकारात्मक विचार वाले अपेक्षाकृत अधिक सुखी और समृद्ध होते हैं जबकी
कमजोर इच्छाशक्ति और नकारात्मक विचार वाले अपेक्षाकृत अधिक दुखी दिखाई पड़ते हैं।
कई बाबाओं में विश्वास करने से लोगों के भीतर खुद की सकारात्मक शक्तियों का विकास
होता है। कई लोग अंगुठी, माला, रूमाल और जाने क्या क्या रखकर सकारात्मक ऊर्जा
महसूस करते हैं। ये ऊर्जा काम भी करती है लेकिन इसका इन टोटकों या चीजों से कोई
लेना देना नहीं होता। ये ऊर्जा हमेशा से भीतर ही होती है। आप सकारात्मक चिंतन के
लिए यदि बाह्य वस्तुओं और लोगों पर निर्भर हो जाएंगे तो आप अंधविश्वासी बन जाएंगे।
दरअसल यही अंधविश्वास की बारीक लकीर है जो आपके भीतर की सकारात्मक ऊर्जा को बाहर
वस्तुओं या बाबाओं में दिखने लगती है। अपने जीवन के उद्देश्य को सामने रखे और फिर
बाबाओं की जरूरत पर खुद विचार करें। यदि आप अपनी क्षुद्र इच्छाओं की पूर्ति के लिए
उनके चक्कर लगा रहे हैं तो सतर्क हो जाईए। यदि कोई बाबा आपकी इच्छाओं की पूर्ति का
दावा कर रहा है तो भी सतर्क रहने की जरूरत है।

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