शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

आप जो कहते हैं, क्या आप वो करते भी हैं?


हमारे पास दूसरों के लिए बिलकुल ठीक ठीक ज्ञान मौजूद है। जब सलाह देने की बात आएगी तो आप पाएंगे कि कई ऐसे मित्र जिन्हें शायद आप सलाह देने के लायक भी नहीं मानते थे, वो कठिन समय पर आपको वो राह दिखा जाएं जिसके बारे में आप सोच भी न पा रहे हो। आप हर एक के ज्ञान पर विश्वास भी नहीं करते और इस अविश्वास का कारण ये भी हो सकता है कि यदि इसके पास इतना ही ज्ञान होता तो ये खुद परेशान क्यूं रहता है? एक सज्जन दुनिया को तंबाकू के दुष्प्रभावों का लेक्चर देते रहते थे। वो इस पर गहरी रिसर्च कर चुके थे और ये भी जानते थे कि इससे कितने खराब रोग इंसान को हो सकते हैं। उनकी इन बातों से प्रभावित होकर एक साथी ने अपनी तंबाकू की आदत पर लगाम लगाने में कामयाबी भी हासिल कर ली।

एक दिन अचानक सड़क पर हुई मुलाकात में तंबाकू छोड़ने वाले युवा ने पाया कि तंबाकू पर लेक्चर देने वाले सज्जन तो खुद ही उसका सेवन कर रहे थे। वो चकित तो हुआ ही साथ ही खुद को ठगा हुआ भी महसूस करने लगा। लेक्चर देने वाले सज्जन भी सकपका गए। वो जानते थे कि व्यवहारिक जीवन में यदि वो किसी बात पर अमल करते नहीं दिखेंगे तो उनकी बातों का सकारात्मक असर किसी पर नहीं होगा। उन्हें ये बहुत ही लज्जा का विषय लगा और उन्होंने इस पर अपने युवा साथी से बात करने की इच्छा जाहिर की।

वो युवा खुद को इस लिहाज से ठगा हुआ महसूस कर रहा था कि जिस आदत को छोड़ने के लिए वो संघर्ष कर रहा है और काफी हद तक उस पर काबू पा चुका है उससे तो ज्ञान देने वाला खुद ही नहीं उबर पाया। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस आदत को छोड़कर मैं इसके आनंद से वंचित रह गया। हो सकता है ये आदत उतनी बुरी न हो जितनी इस आदमी ने मुझे बताई थी? वो बात तो नहीं करना चाहता था लेकिन इस झटके से उबरने के लिए सफाई लेनी भी जरूरी थी। उसने कहा वैसे तो आपकी हर बात ही अब झूठ लगेगी लेकिन फिर भी कहें क्या इस पर भी कोई ज्ञान दे सकते हैं। ज्ञान देने वाले तो ज्ञान देने वाले होते हैं हर विषय पर कुछ कह सकते हैं सो इन्होंने भी कहा कि मैंने तंबाकू के बारे में आज तक जितनी भी बातें कहीं हैं वो सौ फीसदी सही हैं।

ये भी सच है कि तुम यदि इस पर काबू पा रहे हो तो अपने जीवन को शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर बेहतर कर रहे हो। अब प्रश्न उठता है मेरे खुद इस बात को मानने का तो ये बात स्पष्ट है कि जानने और बताने के स्तर पर तो मैं शायद तुमसे बेहतर था लेकिन आजमाने के स्तर पर तुम ज्यादा बेहतर हो। यही वजह है कि मेरे ज्ञान का लाभ मुझे हो न हो तुम्हें जरूर होगा।

खैर उस शख्स ने इस ज्ञानी की बात को माना या नहीं माना ये एक दूसरी कहानी है लेकिन महत्वपूर्ण बात ये हैं कि हम सभी में एक ज्ञानी छिपा बैठा है। किसी और के लिए हमें ठीक ठीक ज्ञान होता है लेकिन जब बात खुद आजमाने की आती है तो हम कई बार उन लोगों से भी पीछे होते हैं जो हमारे ज्ञान से प्रभावित होते हैं। इसका दूसरा पहलु ये भी है कि दूसरों के दिए ज्ञान को भी हमें गंभीरता से लेना चाहिए। कथनी और करनी का फर्क तो अज्ञानी की ही पहचान है और ऐसे कथित ज्ञानी दरअसल अपने निजी जीवन में अज्ञानी ही हैं। आपका अपना व्यक्तित्व ही किसी अन्य के लिए सच्चा ज्ञान हो सकता है। जब व्यक्तित्व और जीवन से ज्ञान खुद सामने आता है तो वाचक ज्ञान की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। जब ज्ञान क्रियान्वयन में आता है तब सच पूछिए बाहरी ज्ञान की भी आवश्यकता नहीं रह जाती है। किसी और के लिए आपका ज्ञान कितना उपयोगी होगा से ज्यादा महत्वपूर्ण ये जानना है कि आपके भीतर मूल रूप से मौजूद ज्ञान का आप व्यवहारिक जीवन में कितना इस्तेमाल करते हैं।

उदाहरण के लिए हम एक बात सामान्य रूप से जानते और पढ़ते आएं हैं कि सत्य में बड़ी शक्ति है और असत्य में भयानक नकारात्मकता, इसके बावजूद अपने जीवन में हम सच झूठ का इस्तेमाल किस तरह करते हैं? तंबाकू खाना हमारे लिए खतरनाक है ये क्या किसी के द्वारा दिए गए ज्ञान के बाद हमें समझ में आएगा? हद तो तब हो जाती है जब ऐसे खतरनाक उत्पादों पर पहले से ही चेतावनी दे दी जाती है कि ये आपके लिए जानलेवा है। ज्ञान देने से ही यदि बात बन जाती तो ऐसे उत्पादों को खरीदने वाले इन चेतावनियों को गंभीरता से लेते।


हमारे जीवन में ऐसी कई वैधानिक चेतावनियां देखने को मिलती हैं। स्वामी शरणानंद के शब्दों में हम सभी को सही गलत का ठीक ठीक ज्ञान होता है यही वजह है कि जब भी कोई हितकारी बात या सत्य बात कहता है हम उसका समर्थन करते हैं। मोटिवेशनल बातें हमें अच्छी लगती हैं क्यूंकि हमारा मन इन बातों का समर्थन करता है। इस समर्थन से ही स्पष्ट है कि ये ज्ञान हममें मूल रूप से मौजूद है। महत्वपूर्ण कार्य है उन कारणों को ढूंढना जिनकी वजह से हमने इस ज्ञान को कहीं दबा दिया है। ये वजहें भी वहीं ज्ञान और उसके क्रियान्वयन का भेद है जो ऊपर दी गई कहानी में हमने देखा। उस ज्ञानी की जगह जरा खुद को रखिए और देखिए की आप जो कहते हैं उसमें कितनी बातों को सचमुच में अमल में लाते हैं? आप ये भी जानने की कोशिश करिए की क्या आप सचमुच वैसे हैं जैसे दुनिया को दिखाते हैं?  विश्वास करिए इन दो सवालों के ईमानदार जवाब आपकी जिंदगी बदल सकते हैं और फिर शायद आपको कभी किसी बाहरी ज्ञान की आवश्यकता भी न पड़े।

रविवार, 10 अप्रैल 2016

मां बहुत भारी मन से आपकी भक्ति स्वीकार कर रही होगी!


मंदिरों में भक्तों की मौत का ये कोई पहला मामला नहीं है। भक्ति भाव से भरे इस देश में लोगों की मंदिरों में अटूट आस्था होती है। अपने भगवान के दर्शनों के लिए देश भर के कोने कोने से भक्त गण इन मंदिरों में जुटते हैं। खास तौर पर त्यौहार के समय दर्शनों का विशेष महत्व कहा जाता है और यही वजह है कि ऐसे मौकों पर भक्तों जबरदस्त भीड़ उमड़ती है। बेकाबू भीड़ की वजह से कई लोगों की मौत होने की घटनाएं भी सामने आई हैं लेकिन इतिहास की इन घटनाओं से हमने कोई सबक नहीं लिया और एक बार फिर एक मंदिर में बड़ा हादसा सामने आया है। आप किसी भी हादसे पर नजर डालते हैं तो मंदिरों में होने वाली बेकाबू भीड़ ही सैंकड़ों लोगों की मौत का कारण बनी है। दुनिया भर में कहा जाता है कि भगवान के लिए आस्था देखनी हो तो भारत आईए। मंदिरों में विशेष आयोजनों, मेलों और त्यौहारों की पुरानी परंपरा है। बीतते वक्त के साथ कई मंदिरों की विशेष मान्यता हो गई और लोगों ने इन्हीं मंदिरों को साक्षात ईश्वर के निवास स्थान के रूप में स्वीकार किया। देश के कोने कोने से अपनी मन्नतों को लिए हजारों लाखों श्रृद्धालू इन मंदिरों में आते हैं और स्वयं के जीवन को धन्य मानते हैं। केरल के मंदिर में हुई घटना से आस्था पर कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मंदिरों और प्रशासन की बदइंतजामी इससे एक बार फिर उजागर होती है। हांलाकि इस बात को समझने की जरूरत है कि सिर्फ प्रशासन ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं है। उत्सव के माहौल में लोगों का एक विशेष समय पर दर्शन करने की मानसिकता भी मंदिरों की व्यवस्था को तार तार कर देती है।

हमारे देश में मंदिरों के प्रति आस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नवरात्र जैसे पावन मौकों पर कई मंदिरों में आनी वाली भीड़ की तादद किसी छोटे मोटे देश की जनसंख्या से ज्यादा होती है। जिस वक्त 2005 में सतारा के मंधार मंदिर में भगदड़ मची थी वहां एक ही समय पर 3 लाख लोगों के होने का दावा किया गया था। ये किसी और देश के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है लेकिन हमारे लिए ये सामान्य बात है। नवरात्र में माता के तमाम शक्ति पीठों और प्रसिद्ध मंदिरों में इसी तरह का माहौल होता है। ये भी सच है कि उत्सव का अपना महत्व है ऐसे में लोगों के मन में श्रद्धा का सैलाब ऐसे अवसरों पर अधिक होता है। हांलाकि हमें उत्सव और भक्ति के फर्क को समझना होगा। रंग गुलाल होली पर और आतिशबाजी दीवाली पर ही अच्छी लगती है, लेकिन क्या ये कहना ठीक होगा कि माता की भक्ति इन नौ दिनों में ही अच्छी लगती है? भक्ति का भी कोई सीज़न हो सकता है क्या? भक्ति के साथ साथ उत्सव का मिलना भी हमारे देश की परंपरा रही है। गणेशोत्सव जैसी परंपरा की शुरूआत तिलक ने इसी परंपरा के तौर पर की थी। माता की उपासना के लिए चैत्र और शरद ऋतु की नवरात्र का महत्व तो हमारी वैदिक परंपरा का हिस्सा है यानि बहुत पुरातन है। इसमें उपवास और उपसाना की विधियों पर भी काफी कुछ लिखा गया है। बदलते दौर में मंदिरों में इन दिनों में, आस्था का अचानक से बढ़ जाना  भीड़ का सबब बन रहा है। मंदिरों में भी मन्नतों का बोझ बढ़ता रहता है। ऐसे मौकों पर मंदिर जाने से जीवन ज्यादा सुखमय होगा और भक्ति के ज्यादा सुंदर परिणाम और फल मिलेंगे कि धारणा ने भी आस्था के सैलाब को मंदिरों की चौखट पर खड़ा किया है।

आस्था पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता लेकिन किसी विशेष समय और विशेष स्थान पर भीड़ लगाकर माता को प्रसन्न करने की गलतफहमी दिमाग से निकालनी होगी। इसे आस्था नहीं कह सकते क्यूं आस्था समय से नहीं बांधी जा सकती। माता की प्रसन्नता इन हादसों में तो कतई नहीं होगी जो आए दिन मंदिरों में देखने को मिलते हैं। मंदिरों पर मन्नतों के साथ साथ भीड़ का बोझ भी समस्या को बढ़ा देता है। ऋतु परिवर्तन के साथ त्यौहार तो मनाए जा सकते हैं लेकिन ईश्वर को मनाने के लिए 9 दिनों की समय सीमा बांधने पर स्वयं विचार करिए। कोई कहे कि आस्था बढ़ जाती है तो भी गलत बात है, क्यूंकि ईश्वर पर आस्था और विश्वास कोई कम या ज्यादा होने वाली बात नहीं है। माता का प्रेम आप पर सिर्फ नौ दिन बरसता है इस बात को भी दिमाग से निकालिए। वो मां है नौ दिन नहीं, नौ महीने नहीं हमेशा आपसे प्रेम करेगी। उसकी भक्ति कहकर भीड़ की धक्का मुक्की में मासूमों को मत कुचलिए। नौ दिनों तक अच्छे काम करने और बुरे कामों को छोड़ने को भक्ति मत कहिए। मैं विश्वास से कहता हूं कि मां आज उत्सव के माहौल में बहुत भारी मन से आपकी भक्ति को स्वीकार कर रही होगी।


शनिवार, 26 मार्च 2016

डर के आगे निकलने के लिए जानें डर है क्या?

कहीं ऐसा न हो जाए? अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्या होगा? आपकी जिंदगी के सारे डर इन ही सवालों के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं। इन दोनों ही सवालों के मूल में है अपेक्षा। अभीष्ट की सिद्धि न हुई तो क्या होगा और अनिष्ट ने आ घेरा तो क्या होगा? डर कुछ भी हो सकता है। आपके करियर से जुड़ा हुआ, रिश्तों से जुड़ा हुआ, सेहत से जुड़ा हुआ, सुरक्षा से जुड़ा हुआ और जितने लोग उतनी कहानियां और उतने ही डर के अलग अलग कारण। कारण बेशक अलग हो सकते हैं लेकिन सबके मूल में सवाल यही है कि कहीं अनिष्ट न हो जाए? अनिष्ट यानि कुछ ऐसा जिसे हम बुरा मानते हैं। एक छोटा सा अभ्यास करें। आज आपके दिल में जो भी डर हैं या यूं कहें कि जिन बातों के होने से आपको डर लगता है उन्हें एक कागज पर लिख लें। अब जरा अपनी याददाश्त पर जोर डालें और पांच साल या दस साल पुराने अपने डर को याद करने की कोशिश करें। जरा मुश्किल होता है क्यूंकि डर की आयू बहुत छोटी होती है जैसे ही समय गुजरता है वो खत्म होता है लेकिन उसकी जगह आने वाले वक्त के कुछ नए डर ले लेते हैं। हम यदि किसी बात के नहीं होने से बार बार डरते हैं और वो हो जाती है तो ये डर इतने गहरे बैठ जाता है कि ऐसी किसी परिस्थिति के बारे में सोच सोच कर ही घबराहट होने लगती है। आप जब कुछ साल पहले के डर पर गौर करते हैं तो आप पाते हैं वो आज आपको नहीं डराता, हां ये हो सकता है कि उसके दोबारा होने का डर आपके मन में पहले से भी ज्यादा गहरे घर कर गया हो।

इस बात को एक उदाहरण के जरिए समझने की कोशिश करते हैं। अब जरा याद करिए उस समय को जब आप स्कूल या कॉलेज में थे। यदि आप स्कूल कॉलेज में हैं तो अपनी पुरानी परीक्षाओं के दौर को याद कीजिए। हर बार परीक्षा का डर मन में आता था और ईश्वर से प्रार्थना शुरू हो जाती थी बस इस बार मदद कर दो फिर सब ठीक हो जाएगा। आगे क्या होता है? कक्षाएं और परिक्षाएं बदलती रहती हैं लेकिन बस इस बार बेड़ा पार लगा दो कि प्रार्थना चलती रहती है। जो प्रार्थना को नहीं भी मानते वो अपने आत्मबल से भी यही गुहार लगाते हैं इस बार ताकत दो। यानि भय परिस्थितियों में छिपा होता है बल्कि और स्पष्ट तौर पर कहा जाए तो अनजान परिस्थितियों में छिपा होता है। अपने जीवन के सफर में आप पाएंगे कि आपके पीछे जीवन की अलग अलग कहानियां हैं। कुछ लोग काफी कुछ देख चुके हैं तो कुछ को काफी कुछ देखना बाकी है। इसके बावजूद जीवन की अलग अलग परिस्थितियों, अलग अलग विचारों और अलग अलग अनुभवो से आपकी अपेक्षाओं और परीक्षाओं के स्वरूप भी अलग अलग हैं। जिस तरह गणित में एक फॉर्मूला अलग अलग अंकों के साथ हर सवाल के सही नतीजे देता है। ठीक उसी तरह जीवन के भी ऐसे फॉर्मूले हैं जिन्हें अलग अलग परिस्थितियों में भी आजमा कर सकारात्मक नतीजे लाए जा सकते हैं।
सकारात्मक नतीजों की चाहत भी कई बार भय का ही कारण बनती है। यदि नतीजे सकारात्मक नहीं आए तो? यही है अभीष्ट के न होने का डर। लेकिन चाहे गणित हो या जीवन फॉर्मूला हमेशा काम करेगा बशर्ते आप उसका सही सही उपयोग करें। डर को जानने के लिए खुद को देखना बहुत जरूरी है। अपने डर में हम इतने खो जाते हैं कि वो हमें किसी मदमस्त घोड़े की तरह हमें अपने पीछे बांधकर घसीटता हुआ ले जाता है। हम छीलते जाते हैं, चोट खाते जाते हैं लेकिन खुद को उससे नहीं छुड़ा पाते। डर का बढ़ते जाना इस घोड़े की ताकत का बढ़ते चले जाना है। जितना डरेंगे उतनी ही इसकी रफ्तार बढ़ेगी और उतनी ही आपकी तकलीफ। जब अपने डर को देखना शुरू करते हैं तो आप पाते हैं कि ये आपके अपने विचारों और अपने विषय में आपकी मान्यताओं से ही पैदा हुआ है। कई मासूम बच्चे परीक्षाओं में फेल होने पर इतने भयभीत होते हैं कि मौत को गले लगा लेते हैं। कई लोग अपने रिश्तों की परीक्षा में फेल होने पर भी इस तरह के कदम उठाते हैं। कोई भी मामला उठाकर देख लीजिए स्वस्थ लोगों को ऐसे भयग्रस्त लोग बीमार ही दिखाई पड़ते हैं। दरअसल ये भयंकर मनोरोग है भी। छोटे छोटे डर कब विकराल रूप ले लेते हैं हमें समझ ही नहीं आता। हमें ये भय मृत्यु के समान लगता है लेकिन इसके बारे में जितना सोचते हैं ये उतना ही बढ़ता जाता है। भय को देखना और उसको जानना पहला कदम है। जब आप पुराने भय के आज कोई अस्तित्व नहीं होने का अहसास करते हैं तो आपको कुछ कुछ इस बात का भी अहसास करना चाहिए कि वर्तमान में जो बातें आपको परेशान कर रही हैं या डरा रही है उनका भी कोई अस्तित्व नहीं रहेगा। जब आप समय के साथ परिस्थिति परिवर्तन के फॉर्मूले को समझते हैं तो जीवन के उतार चढ़ाव को सहजता से देखना शुरू करते हैं। दुनिया में ऐसा कोई नहीं जो सिर्फ सुखद परिस्थितियां ही देखता है और ऐसा भी कोई नहीं जो सिर्फ दुखद परिस्थितियां देखता है।

भय का सबसे बड़ा भोजन उसका सतत चिंतन है। आपको अपने विचारों को विराम देने का अभ्यास आना चाहिए। आपके मस्तिष्क में उठने वाले विचार ही आपका मन बना रहे हैं और फिर यही मन आपके व्यक्तित्व को बना रहा है। बीज रूप से विचार ही भय को लाते हैं और विचार ही इस भय के अंत का एक मात्र उपाय हैं। आप नकारात्मक विचारों के सतत चिंतन से भयग्रस्त होते हैं तो इनके विपरीत विचारों या सकारात्मक चिंतन से आप इस भय को कमजोर कर सकते हैं। परिस्थितियां एक जैसी नहीं रहती है। यदि परिस्थितियां बहुत सुंदर नहीं है तो धैर्य रखिए उनमें सकारात्मक परिवर्तन आएगा। यदि परिस्थितिया बहुत सुंदर हैं तो उन्हें जकड़ रखने का असफल प्रयास न करिए उनके खोने का डर भी उतना ही भयानक है जितना बुरी परिस्थितियों मे जीने का। स्वामी शरणानंद जी के शब्दों में आप स्वयं को मिली परिस्थितियों का एक समान सकारात्मक उपयोग कर सकते हैं। यदि आपको कठिन या दुखद दिखने वाली परिस्थितियां मिली हैं तो त्याग का बल अपने भीतर पैदा कीजिए। यदि आपको सुखद परिस्थितियां मिली हैं तो अपने भीतर सेवा का बल पैदा कीजिए। त्याग का अर्थ है जो नहीं है का चिंतन करने के बजाए जो है उसके प्रति कृतज्ञता का भाव पैदा करना। यदि किसी के पास तमाम दौलत हो लेकिन सेहत न हो तो उसकी दौलत किस काम की, लेकिन जिसके पास दौलत नहीं और सेहत है वो क्या इस सेहत की कद्र कर पाता है? वो क्या इसका सदुपयोग कर पाता है? यदि करता है तो वो कभी भयग्रस्त नहीं रहेगा और यदि नहीं करता है तो वो अपना समय, ऊर्जा और ईश्वर से मिले गुणों का दुरपयोग ही कर रहा है। भय कुछ और नहीं स्वयं को मिली परिस्थितियों का दुरपयोग और व्यर्थ चिंतन है। परिस्थितियां कभी भी स्थायी नहीं रहती ये एक मंत्र परिस्थितियों की अनुपयोगिता को सिद्ध करने के लिए काफी है। परिस्थिति चिंतन से बाहर निकलिए और देखिए कैसे भय छूमंतर हो जाता है।

बुधवार, 16 मार्च 2016

बुरा काम आलोचना का शिकार होता है, तो अच्छा काम ईर्ष्या का !


हम बुरा काम करेंगे तो आलोचना का शिकार होंगे और अच्छा काम करेंगे तो ईर्ष्या का शिकार होंगे। कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी एक कविता का जिक्र करते हुए ये बात कही थी। ये वाकई ऐसा सच है जिसे हम आए दिन अपने जीवन में देखते रहते हैं। हां समझ के फेर की वजह से हम कई बार सकारात्मक आलोचना को भी ईर्ष्या की श्रेणी में रख देते हैं। हांलाकि सकारात्मक आलोचना के बजाए वर्तमान समय में ईर्ष्यालू प्रवृत्ति बहुत सामान्य तौर पर दिखाई देने लगी है। ईर्ष्या के मूल और उसके दुष्प्रभावों को समझना बहुत जरूरी है क्यूंकि ये सिर्फ एक आदत नहीं बल्कि एक मनोरोग की तरह है। हम किसी से ईर्ष्या क्यूं करते हैंदरअसल इस एक प्रश्न में ही हमारे व्यवसायिक, सामाजिक और पारिवारिक जीवन का ताना बाना बुना रहता है। हम किसी प्रयास में असफल होते हैं तो फौरन ही बहुत से लोग की निंदा और आलोचना करने के लिए खड़े होते हैं। अपने जीवन में मिलने वाली असफलताओं के डर से भागने वाले तमाम लोग दूसरों को असफल होते देख एक सुखानुभूति में चले जाते हैं। हद तो तब हो जाती है जब लोग किसी अन्य की सफलता से भी भय खाने लगते हैं। वो जो खुद नहीं कर पाए यदि कोई और करता दिखता है तो उन्हें भयानक कष्ट का अनुभव होता है। कई लोग अपनी सफलता से ज्यादा दूसरों की असफलता की प्रार्थना में व्यस्त हो जाते हैं। इन बातों को यहां लिखने की और समझने की जरूरत इसीलिए है क्यूंकि दूसरे लोग क्या कर रहे हैं, कैसे सोच रहे हैं, क्या करते हैं से ज्यादा जरूरी है खुद पर नजर रखना। जब दूसरों के मन में पैदा होने वाली ईर्ष्या की बात होती है तो हो सकता है आप समर्थन करने में एक पल न लगाएं, लेकिन जब आपके भीतर ईर्ष्या के बीज की बात होती है तो आप इसे जाहिर करना तो बहुत दूर की बात है स्वीकार तक नहीं करेंगे। ये बताने या स्वीकार करने का विषय है भी नहीं। हां अगर आप स्वयं इस बात को लेकर सतर्क हो जाते हैं तो अपने जीवन में कई सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं।

अच्छा काम आपको ईर्ष्या का शिकार बनाता है लेकिन ऐसा तभी होता है जब आपने अपने इर्द गिर्द ईर्ष्यालू लोगों का जमावड़ा लगा लिया हो। ईर्ष्या नजदीक के लोग ही करते हैं आप कभी भी अच्छे कामों को लेकर अनजान लोगों की ईर्ष्या का शिकार नहीं होते हैं। हां कई बार आपकी शोहरत, संपन्नता जैसी विभूतियां ऐसी चीजों को ना पाने वालों के भीतर ईर्ष्या पैदा करती हैं। ये उदाहरण इसीलिए रखना जरूरी है क्यूंकि ईर्ष्या के मूल में अन्य लोगों की तरह किसी वस्तु, या परिस्थिति को  पाने की अक्षमता होती है। आपके भीतर यदि ईर्ष्या का बीज है तो वो आपको अक्षम ही बनाए रखेगा। एक सामान्य मनोविज्ञान है कि आप अपने सामर्थ्य से थोड़ा आगे ही सोचते हैं। यही वजह है कि ज्यादातर ईर्ष्या के बीज अपने ही घर में या दफ्तर में देखने को मिलते हैं। औरों की ईर्ष्या का इलाज आपके पास नहीं है क्यूंकि ये उनकी अपनी मनःस्तिथि या परेशानी है। हां आप अपने भीतर से इस ईर्ष्या को निकालकर फेंक सकते हैं। इसे निकालकर फेंकने की जरूरत इसीलिए है क्यूंकि ये एक ऐसा अवगुण है जो हमारी क्षमता और सोचने के तरीके को दूषित करता है। औरों की ईर्ष्या से प्रभावित होकर यदि आप उस पर प्रतिक्रिया देते हैं तो आप उन्हें और ईर्ष्या का ईंधन दे रहे हैं। यही बात आपकी ईर्ष्या पर भी लागू होती है। किसी और की आपके लिए की गई ईर्ष्या के प्रत्यूत्तर में आपके द्वारा भी उसे यदि ईर्ष्या ही दी जाती है तो आप भी उसी रोग के शिकार हो जाते हैं। ये शुरू एक आदत से होती है लेकिन खत्म एक बीमारी पर होती है। बीमारी भी ऐसी की आप अपने जीवन को छोड़कर औरों के जीवन में ही तांकझांक करते रहते हैं। किसी और को आगे बढ़ते देख आपको घबराहट का अनुभव होने लगता है। लगभग हर नाकाम व्यक्ति की यही अवस्था देखने को मिलेगी। ये उसकी नाकामी को तो दिखाता ही साथ ही भविष्य में उसकी सफल होने की संभावनाओं के भी जड़मूल नष्ट होने की निशानी है।

ईर्ष्यालू प्रवृत्ति एक गलत अभ्यास से पनपनती है और यदि सही अभ्यास किया जाए तो इसे खत्म भी किया जा सकता है। अब प्रश्न उठता है कि आखिर वो सही तरीका क्या हैयदि आप ईर्ष्या का शिकार हो रहे हैं तो समझ लीजिए आप अच्छा काम कर रहे हैं। क्यूंकि इसके अलावा ईर्ष्या के मूल में और कुछ हो ही नहीं सकता। अब बस अपने काम को जारी रखते हुए आपको अन्य लोगों की ईर्ष्या को नजरअंदाज करना होगा। अपने जीवन को उनके साथ सामान्य रखना होगा। क्यूंकि सामान्यतः हम ईर्ष्या करने वालों से खुद भी ईर्ष्या करने लगते हैं। इसी तरह यदि किसी के भीतर ईर्ष्या पैदा करने के लिए आप किसी काम को कर रहे हैं तो आप अपने भीतर भी रोग ही उत्पन्न कर रहे हैं। यदि आप स्वभाविक रूप से अपने काम में आगे बढ़ते हुए इस ईर्ष्या को अपने इर्द गिर्द पाते हैं तो ईर्ष्यालू लोगों के लिए भी आपको करुणा का भाव रखना होगा। यदि आप उनसे बात करना बंद करते हैं या ईर्ष्यावश उठाए उनके कदमों पर आप प्रतिक्रिया देना शुरू करते हैं तो आप इस प्रवृत्ति को और हवा दे देते हैं। दूसरी स्थिति ये है कि आप स्वयं ईर्ष्यालू प्रवृत्ति के हैं। यदि आपके भीतर ईर्ष्या घर कर रही है तब आपको अपनी क्षमताओं के विषय में चिंतन करना चाहिए। यदि आप किसी सामान्य सामर्थ्य वाले या आपके समकक्ष सामार्थ्य वाले से ईर्ष्या कर रहे हैं तो तय है कि आप में सफलता की भूख इतनी घर कर चुकी है कि किसी अन्य को मिलने वाली एक छोटी सी सफलता भी आपको चुभने लगती है। ये भी भयंकर मनोरोग ही है। इससे बचना इसीलिए जरूरी है क्यूंकि ईर्ष्यालू प्रवृत्ति आपकी क्षमता को लगातार कम करती है। आपके विचारों की गति ही आपके जीवन में मिलने वाली सफलता या असफलता को तय करती है। 

यदि आप ईर्ष्यालू मन के साथ विचार कर रहे हैं तो आप कभी स्वस्थ चिंतन नहीं कर पाएंगे। आप को गंभीरता से इस ईर्ष्या के मूल पर विचार करना होगा। आप अपने भाई से, दोस्त से या दफ्तर के किसी सहयोगी से ईर्ष्या करते हैं लेकिन किसी बड़े फिल्म स्टार या किसी अन्य बहुत बड़े व्यक्ति से शायद नहीं करेंगे। इसकी वजह ये है कि आप अपने आपको एक सीमित दायरे में बांध लेते हैं। उसी दायरे में खुद को उत्कृष्ट बनाने की एक अंधी दौड़ शुरू हो जाती है। हमेशा याद रखिए उत्कृष्टता किसी दायरे के लिए नहीं होती है। यदि आप स्वयं के व्यक्तित्व को सचमुच बड़ा और प्रभावशाली बनाना चाहते हैं तो आपको क्षूद्र दायरों से निकलकर स्वयं के उत्थान और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक गुणों पर सतत चिंतन करना चाहिए। अभ्यास और समय का बेजोड़ मेल आपको जीवन में आदर्श का पात्र बनाता है न कि ईर्ष्या का। जो आज आदर्श हैं वो भी कभी ईर्ष्या के शिकार हुए होंगे, लेकिन सतत अपने लक्ष्य के प्रति सतर्कता, अन्य लोगों से ईर्ष्या न करना और स्वयं अन्य लोगों के द्वारा की जा रही ईर्ष्या के प्रति उदासीन रहना उनके आदर्श बनने का मूल मंत्र बना।

रविवार, 13 मार्च 2016

अंधविश्वास और आस्था के बीच की बारीक लकीर


बाबाओं की इस समाज में क्या जरूरत है? बाबा हैं और उनके पीछे बहुत बड़ी भीड़ भी है। नेताओं अभिनेताओं से कहीं ज्यादा बड़ी भीड़। बाबा कुछ भी करें लोग उनके पीछे होते हैं। जब वो व्यवसाय में उतरते हैं तो बड़ी बड़ी कंपनियों के पसीने छूट जाते हैं। जब वो राजनीति के अखाड़े में आते हैं तो उनके एक इशारे पर समीकरण बदल जाते हैं। नेता, व्यवसायी या शोहरत और ताकत वाले लोग भी बाबाओं की शरण में दिखाई पड़ते हैं। ये तो साफ है कि बाबाओं में कुछ तो बात होती है जो लोग उनसे बंधते चले जाते हैं। पुराने संतों की बात करें तो उनका प्रभाव इतना जबरदस्त होता है कि उनके नाम पर धर्म संप्रदाय भी बन जाते हैं। आज समाज के ताने बाने को देखें तो विज्ञान ने सुविधा के साधन तो दिए हैं लेकिन सामाजिक ताना बाना आध्यात्मिक लोगों का ही दिया हुआ है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सभी बाबाओं या संतों ने समाज को सही दिशा नहीं दिखाई है। जहां कई सच्चे संत हुए तो कई ऐसे संत भी हुए जिन्होंने इस समाज को अंधविश्वास भी दिया है। बाबाओं की तो समाज को हमेशा से जरूरत रही है और आगे भी रहेगी लेकिन किसके पीछे चलना और किससे बचना की समझ तो समाज को खुद ही विकसित करनी होगी। अब बाबाओं के पीछे चलने की वजहों पर विचार करते हैं। पहली वजह तो ये कि वो कोई ऐसी दैवीय शक्तियां विकसित कर लेते हैं जो आम लोगों में नहीं होती। ये एक ऐसी मान्यता है जो सामान्य बुद्धि के लगभग सभी लोगों में घर कर जाती है। दूसरी वजह है अपने निजी जीवन का विकास।
स्वामी गंगाराम वर्तमान संत परंपरा में एक ऐसा नाम हैं जो अंधविश्वासों
के खिलाफ भक्तों और शिष्यों को जागरूक कर रहे हैं। निर्विचारता की
अवस्था से निर्विकल्प समाधि को प्राप्त करने की सहज विधि नाद ब्रह्म के
वो विरले जानकार हैं। इसका जीवन में क्या महत्व है और कैसे मानव
जीवन का अंतिम लक्ष्य चिर शांति और प्रेम की प्राप्ति है पर वो बहुत
ही सहजता से शिष्यों का मार्गदर्शन करते हैं।
पहली वजह में कुछ सच्चाई है तो बहुत कुछ झूठी धारणाएं भी हैं। सच्चाई ये है कि सच्चे संत वीत राग या वैराग्य को प्राप्त होते हैं। वे जीवन से भेद और इच्छाओं का अंत कर देते हैं। अष्टांग योग से एक ऐसे चरित्र और जीवन का निर्माण करते हैं जो समाज के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है। वे मनुष्य जीवन के उत्थान और पतन को साक्षी भाव से देखते हैं और इसीलिए उनकी दृष्टि अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं मे फंसे सामान्य मनुष्य से ज्यादा तीव्र और प्रभावशाली होती है। जो राग द्वेष से मुक्त है वो भय से मुक्त है। अपना कल्याण चाहने वाला हर मनुष्य भय के समूल नाश के लिए सच्चे संतों की शरण में जाता है। संत का जीवन एक ऐसा आदर्श है जो उसमें ये प्रेरणा पैदा करता है कि हर मनुष्य इसी तरह के शांत और उत्तम जीवन को प्राप्त कर सकता है। इस तरह के जीवन का अर्थ ये नहीं कि सभी आश्रम बनाकर भगवा धारण कर लें बल्कि कोई भी कहीं भी जो कुछ भी कर रहा है उसे वहीं करते हुए सत्य के गुणों का विकास अपने भीतर करने का साहस मिलता है।

राजपाठ छोड़ने वाले बुद्ध को जो जीवन मिला वही जीवन ताउम्र जुलाहे का काम करने वाले कबीर को मिला। वही शांत जीवन क्रूर हत्यारे अंगुलीमाल को बुद्ध की शरण में आने से मिला। आज भी कई ऐसे संत है जो सचमुच अपने जीवन से ऐसा आदर्श प्रस्तुत करते हैं। नाद ब्रह्म के परम ज्ञानी स्वामी गंगाराम भी ऐसे विरले संत हैं जिनका अपना जीवन प्रेरणा से भरा है। ऐसे ही आज के दौर के कई सच्चे संत आपको मिल जाएंगे। हमें तय करना है कि हम किन गुणों का विकास करने के लिए, कैसा जीवन पाने के लिए इन संतों के पास जा रहे हैं। यदि हम कभी न खत्म होने वाले सुख और शांति की तलाश में जा रहे हैं, यदि हम सत चित आनंद की तलाश में जा रहे हैं तो वो हमें सच्चे संतों की शरण में हमेशा मिलेगा वो चाहे सशरीर हमारे साथ हो या न हो। अब बात करते हैं बाबाओं के पीछे जाने वालों की बड़ी तादाद की और ये ज्यादा गंभीर मसला है क्यूंकि यही अंधविश्वास और आस्था के बीच की बारीक लकीर पार हो जाती है।

ज्यादातर लोग अपने अभीष्ट कामों की सिद्धि के लिए बाबाओं के चक्कर लगाते हैं। इन लोगों के लालच का फायदा उठाते हुए कई लोगों इनकी तुच्छ कामना पूर्ति के लिए कई स्वांग रच लेते हैं। ये स्वांग धीरे धीरे लोगों में अंधविश्वास के रूप में घर कर जाते हैं। टोने टोटकों का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। कई लोगों को अजीबो गरीब लगने वाली सलाहें भी अपने भाग्य परिवर्तन का तरीका महसूस होने लगती हैं। उनमें से कुछ के आजमाने के बाद यदि कोई सकारात्मक परिणाम निकलता है तो बाकी आंखें बंद कर उसके पीछ चलने लगते हैं। ये नियम है कि उत्थान पतन चलता रहेगा। अच्छे बुरे परिणाम दुनियावी बातों में आते रहते हैं। किसी के जीवन में सतत सफलता या सतत असफलता नहीं होती। आंशिक सुख और आंशिक दुख बना रहता है। हमारे अपने प्रयासों और विचार शक्ति से सुख या दुख का जीवन पर असर पड़ता है। सकारात्मक विचार वाले अपेक्षाकृत अधिक सुखी और समृद्ध होते हैं जबकी कमजोर इच्छाशक्ति और नकारात्मक विचार वाले अपेक्षाकृत अधिक दुखी दिखाई पड़ते हैं। कई बाबाओं में विश्वास करने से लोगों के भीतर खुद की सकारात्मक शक्तियों का विकास होता है। कई लोग अंगुठी, माला, रूमाल और जाने क्या क्या रखकर सकारात्मक ऊर्जा महसूस करते हैं। ये ऊर्जा काम भी करती है लेकिन इसका इन टोटकों या चीजों से कोई लेना देना नहीं होता। ये ऊर्जा हमेशा से भीतर ही होती है। आप सकारात्मक चिंतन के लिए यदि बाह्य वस्तुओं और लोगों पर निर्भर हो जाएंगे तो आप अंधविश्वासी बन जाएंगे। दरअसल यही अंधविश्वास की बारीक लकीर है जो आपके भीतर की सकारात्मक ऊर्जा को बाहर वस्तुओं या बाबाओं में दिखने लगती है। अपने जीवन के उद्देश्य को सामने रखे और फिर बाबाओं की जरूरत पर खुद विचार करें। यदि आप अपनी क्षुद्र इच्छाओं की पूर्ति के लिए उनके चक्कर लगा रहे हैं तो सतर्क हो जाईए। यदि कोई बाबा आपकी इच्छाओं की पूर्ति का दावा कर रहा है तो भी सतर्क रहने की जरूरत है। 

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

शरीर के विश्राम से ज्यादा जरूरी है मन का विश्राम


दिन भर की भागदौड़ के बाद जब हम थक कर चूर हो जाते हैं तो बस यही मन करता है कि अब बिस्तर पर गिरते ही नींद आ जाए। होता भी यही है और जब नींद खुलती है तो लगता है थकान अब भी बाकी है। फिर वहीं रोजमर्रा की जिंदगी और फिर वहीं थकान। फिर आता है छुट्टी का दिन, लेकिन ये क्या, छुट्टी के दिन तो हमारे इतने सारे काम पहले से ही पेंडिंग पड़े हैं उन्हें कब निपटाएंगे? और फिर इन कामों को करें या ना करें लेकिन सोच सोच कर ही थकान इतनी ज्यादा हो जाती है कि चिढ़ होने लगती है। लगभग सभी की कहानी मिलती जुलती होती है लेकिन कहानियों में एक फर्क भी देखने को मिलता है। कुछ लोग अपने जीवन में नित नई ऊर्जा भरते जाते हैं, आगे बढ़ते जाते हैं, तो कुछ लोग लगातार थकते जाते हैं और एक दिन इतना थक जाते हैं कि उनके जीवन से आनंद का रस ही खत्म हो जाता है। उन्हें किसी काम में मजा ही नहीं आता। यहां तक की उन्हें कोई नई बात कह भर दी जाए तो वो आगबबूला हो जाते हैं। इसकी वजह है शरीर की थकान से भी खतरनाक मन की थकान। चौंकिए मत, जी हां ये सच है कि आपका मन भी थक जाता है और मन की ये थकान इतनी खतरनाक है कि उसके बाद सिवाय अवसाद के और कुछ आपके जीवन में नहीं रह जाता। ये दुनिया वहीं है, ये लोग वहीं हैं, ये कुदरत वही है, लेकिन इसके बावजूद आपके भीतर बहुत कुछ बदल रहा है। ये बदलाव यदि सकारात्मक है तो आप जीवन के उच्चतम स्तर को पाएंगे और इसके उलट ये बदलाव यदि नकारात्मक है तो एक दिन आप भी मन की थकान के उस आखिरी स्तर पर पहुंच जाएंगे जिसे अवसाद कहते हैं। जैसे कभी न खत्म होने वाले आनंद का जिक्र मिलता है वैसे ही कभी न खत्म होने वाले अवसाद, नीरसता और चिढ़ का भी अस्तित्व होता है।
स्वामी विवेकानंद चित्त की वृत्तियों को एक तार साधने के लिए दोनों आंखों के मध्य
त्रिनेत्र के स्थान पर ज्योति प्रकाश को देखा करते थे। आप त्राटक की कई विधियों से
शुरुआत में ध्यान की इस अवस्था का अभ्यास कर सकते हैं और बाद में ये आपके लिए
स्वतःसिद्ध प्रक्रिया बन सकती है। अपने इर्द गिर्द की आवाजों के प्रति सतर्कता और फिर
प्रकृति के संगीत, भीतर के संगीत यानि अनहद नाद या ब्रह्मनाद को सुनन भी
ध्यान की उत्तम विधा है। इसके विरले ज्ञानी स्वामी गंगाराम जी से मुझे भी नाद को
सुनने और समझने की दीक्षा मिली है।
आपको तय करना है कि आप किस रास्ते चल रहे हैं और सच पूछिए तो इसे आप ही जान सकते हैं। दरअसल आप क्या कर रहे हैं से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि आप किसी काम को किस मनोभाव के साथ कर रहे हैं। यदि आप ईर्ष्या और थकान से भरकर किसी काम को करते हैं तो खुद को और थकाते हैं। शरीर को आराम देने के लिए हम विश्राम जानते हैं। हम आखें बंद कर या कहीं बैठकर या लेटकर शरीर की थकान दूर करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जीवन में नीरसता के लिए शारीरिक थकान बहुत कम जिम्मेदार होती है जबकी मन की थकान आपकी निराशा के मूल में होती है। घर में जब कोई शादी समारोह या कोई बड़ा काम होता है तो सभी लोगों में एक ऊर्जा आ जाती है। खास तौर पर घर की महिलाएं दिन रात जुटी रहती हैं। लेकिन जैसे ही वो कार्यक्रम खत्म होता है वो पस्त हो जाते हैं। उनमें से कुछ बीमार हो जाते हैं। कुछ दो तीन दिन तक सोते रहने की बातें करते हैं। ये आपके भी जीवन का अनुभव रहा होगा कि जब आप किसी काम को पूरे रस के साथ करते हैं तो समय और थकान का आभास ही नहीं रहता और जैसे ही उस काम की पूर्णता होती है आप बुरी तरह से थकान महसूस करते हैं।
जीवन में यही रस आपकी सकारात्मक ऊर्जा के मूल में है। क्यूंकि हम जीवन के अन्य कामों में अपने मन की थकान से निराशा का अनुभव करते हैं इसीलिए थकान और अरुचि जीवन में घर करती जाती है। आप किसी काम को रोज रोज करते हैं या किसी भी बात का दोहराव आपको कोल्हू के बैल की भांति जीवन जीने का भी अनुभव देता है। दरअसल हम शारीरिक श्रम से जिस तरह शारीरिक थकान का अनुभव करते हैं ठीक वैसे ही मन और मस्तिष्क के श्रम से हम मानसिक थकान का अनुभव करते हैं। शारीरिक रूप से जिन कामों को बार बार करते हैं उनसे स्वभाविक रूप से अरुचि होने लगती है। आप रोज रोज एक तरह की सब्जी नहीं खा सकते, आप रोज रोज एक जैसा काम करने से होने वाली अरुचि से भी वाकिफ हैं, ये दोहराव हमारे जीवन में नीरसता लाता है। अब जरा सोचिए एक जैसे विचारों को 24 घंटे सोचते रहने से हमारे मन पर इस दोहराव के क्या नतीजे आते होंगे? जी हां मन की थकान और नीरसता की बड़ी वजह एक जैसे विचारों के मकड़जाल में फंस कर रह जाना ही है। शरीर के विश्राम की तरह अव्वल तो आपको मन के विश्राम की भी व्यवस्था करनी चाहिए। मन कुछ और नहीं आपके विचारों का पुलिंदा है। इन विचारों को कुछ पलों के लिए विराम देकर आप चाहे तो अपने मन को शांत कर सकते हैं। अपने विचारों को देखना स्वयं के स्वरूप पर ध्यान देना इसकी प्रारंभिक विधियां हो सकती हैं। फिर ध्यान की ऐसी कई विधियां हैं जो आपको चित्त की वृत्तियों या आपके विचारों को तेल धारावत चलना सिखाती हैं। आप यदि मन को विश्राम देना सीख लेते हैं तो अपने जीवन से हमेशा हमेशा के नीरसता का नाश कर सकते हैं। नीरसता बाहर नहीं भीतर हैं और इसी तरह रस भी बाहर नहीं भीतर ही है। जब तक रस की तलाश बाहर होती रहेगी, भीतर की नीरसता ताकतवर बनी रहेगी। जब तक नीरसता है मन थका हुआ रहेगा और मन की ये थकान आपकी हर थकान के मूल में है।

कल्पना जगत में रहकर अपने वर्तमान से हटकर किसी अप्राप्त परिस्थिति का चिंतन आपको विचारों के इस दुहराव तक ले जाता है। आपने अपने भीतर अपनी एक दुनिया बसाई है, एक ऐसा कल्पनाजगत जिसमें आपने तमाम किरदार बना रखे हैं। कोई अच्छा है कोई बुरा है, कोई हितैषी है कोई ईर्ष्यालू है तो किसी से आप ईर्ष्या करते हैं। कोई आप से कुछ चाहता है तो किसी से आप कुछ चाहते हैं। आपकी इस फिल्म के जाने कितने किरदार हैं। इसी तरह आपने अच्छी बुरी परिस्थितियों का भी खाका बना रखा है। मन की बात होगी तो शुभ परस्थितियां और मन की नहीं हुई तो अशुभ। फिर अशुभ के भय की कल्पनाएं तो शुभ की प्राप्ति की कल्पनाएँ शुरू हो जाती हैं। ये ऐसी प्रक्रिया है जो सतत आपके भीतर चल रही है। जिसने इस प्रक्रिया को देखना सीख लिया और अगले चरण में इसके प्रति सतर्क होना सीख लिया, उसने अपने मन को काबू करने की शुरूआत कर दी है। फिर वर्तमान के प्रति जागृति, विचारों के प्रति सतर्कता और कुछ समय किया ध्यान का सतत अभ्यास स्वतः ही आपका आगे का मार्ग प्रशस्त करता है।

बुधवार, 1 जुलाई 2015

योग को पहले समझिए फिर समझाइए!!!

21 जून को "अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" घोषित किया गया है। 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को "अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस" को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है। इससे पहले 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र संघ में दिए अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग के महत्व पर प्रकाश डाला था और ये प्रस्ताव सभी सदस्यों के सामने रखा था। ये वाकई बहुत खुशी की बात है कि योग के बारे में हम फिर बात कर रहे हैं। योग का प्रचार करने वाले भी एक ही मंच पर आ रहे हैं और योग के प्रति जागरूकता बढ़ाने की ओर भी ये एक महत्वपूर्ण कदम दिखाई देता है। मोदी जी ने सत्ता में आने के बाद गांव शहर की स्वच्छता के लिए अभियान की शुरूआत की थी। उसे एक उत्सव का रूप दिया था। इसके लिए बहुत प्रचार प्रसार भी किया गया और अब भी इस अभियान को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसी धूम धाम के साथ योग को भी उत्सव का रूप दिया गया है और ये भी एक सराहनीय पहल कही जानी चाहिए। महत्वपूर्ण प्रश्न ये उठता है कि चाहे बाहर की सफाई हो या योग से भीतर की सफाई हो इस मकसद को क्या सही तरीके से लोगों तक पहुंचाने में कामयाबी मिल रही है? ये महत्वकांक्षी पहल है लेकिन क्या इसे सही तरीके से अंजाम तक पहुंचाया जा सकता है?
स्वामी विवेकानंद
यूं तो भारतवर्ष का ठीक-ठीक इतिहास कोई नहीं बता सकता क्यूंकि हम पिछले कुछ 400-500 सालों के इर्द-गिर्द ही अपने इतिहास को खंगालते रहते हैं। हमारे इतिहास को मिटाने और दबाने की भी बहुत कोशिशें की गईं और बहुत हद तक आज के हालात देखकर ये लगता भी है कि उन कोशिशों में आने वाले समय तक लोगों को भ्रमित रखने की कितनी ताकत थी। वेदांत इतिहास की कहानी तो नहीं कहते लेकिन हमारी जड़ को जरूर समझाते हैं। समय-समय पर कई महापुरूषों का अवतरण हुआ और उन्होंने भारतीय वैदिक परंपरा को जन जन तक पहुंचाने का बीड़ा अपने कंधों पर उठाया। उन लोगों को निराशा हाथ लगेगी जो अभी तक की बातों को पढ़ने के बाद ये सोच रहे हैं कि वर्तमान के प्रयासों को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। स्वामी चिन्मयानंद से ऑस्ट्रैलिया में एक इंटरव्यू के दौरान प्रश्न पूछा गया था कि भारत में जाति, धर्म की जो परिभाषाएं हैं उसे वैश्विक कैसे कहा जा सकता है? भारत में धर्म को लेकर तर्कसम्मत बात नहीं की जाती है? इस प्रश्न के जवाब में स्वामी जी ने बहुत ही सुंदर जवाब देते हुए कहा था कि सिर्फ भारत में ही धर्म को लेकर तर्कसम्मत बात की जाती है बाकी देशों में धर्म का मूल तत्व ही अभी किसी को समझ में नहीं आया है। वेदांत की बातों को घुमा फिराकर नए ग्रंथों की रचना तो कर ली गई लेकिन उन्हें समझाने की प्रक्रिया पर ध्यान नहीं दिया गया। जैसे अलग अलग काल परिस्थिती के लोगों के लिए भोजन, परिधान आदि अलग अलग होते हैं वैसे ही ईश्वर प्राप्ति के मार्ग अलग अलग बना लिए जाते हैं लेकिन वे जाते एक ही तरफ हैं और उनके सिद्धांत भी एक ही होते हैं। आप चर्च में हो, मस्जिद में या मंदिर में सिर्फ कर्मकांड और बाहरी आवरण में बदलाव है मूल रूप से रास्ता एक ही है। ये रास्ता वेदांत दर्शन या हमारा योग शास्त्र ही दिखाता है।
स्वामी जी ने इस बात को भी स्वीकार किया था कि सही तरीके से वेदांत को जानने वालों की कमी की वजह से आज बहुत सी भ्रांतियां भारत में फैल गईं हैं। वर्तमान में अंधविश्वास या आस्था के नाम पर खिलवाड़ करने वाले लोगों ने इसी कमी का फायदा उठाया और पूर्ण रूप से निजता के विषय आध्यात्म और ईश्वर प्राप्ति को व्यवसाय का स्वरूप दे दिया। विवेकानंद अपने समय में इस बात को समझ गए थे और वेदांत की अद्भुत शक्ति के बावजूद उसके पूरी दुनिया में होते उपहास से व्यथित भी थे। यही वजह रही कि बिना संसाधनों और बिना किसी सुख सुविधा के वे यायावर की तरह पूरे देश का भ्रमण करते रहे। सचमुच योग को विश्व के सामने रखना का उनका जुनून उन्हे शिकागो धर्म सभा में ले गया। इस भाषण के बाद पूरी दुनिया में उनके द्वारा वेदांत दर्शन के प्रचार और मात्र 39 वर्ष के अपने छोटे से जीवन काल में तमाम ग्रंथों के भाष्य से पूरी दुनिया परिचित ही हैं। आज एक बार फिर उन्हीं विवेकानंद को याद किया जा रहा है, योग की शक्ति को भी याद किया जा रहा है जितने भी संस्थान इन महान योगियों द्वारा स्थापित किए गए थे उनमें कार्यरत कर्मचारी भी अपनी अपनी तरह से इस उत्सव का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
स्वामी शरणानंद
अब महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि चाहे वे विवेकानंद हों, योगानंद हों, स्वामी चिन्मयानंद हों या ऐसे कई महान योगी हुए जिन्होंने योग का सही मायने में प्रचार किया, इनकी तरह योग को जानने वाले और मानव कल्याण के लिए समर्पित लोग हमारे बीच क्या आज भी हैं? हमें किसी भी काम को सीखने के लिए विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती है। क्या योग को सचमुच जानने वाले विशेषज्ञ हमारे पास हैं? इसका उत्तर अतीत के तमाम योगीजन कई मौकों पर दे चुके हैं। उनका कहना था कि हमारा वेदांत दर्शन हमें अद्वैत सिखाता है। दूसरा कोई नहीं है, यानि भेद का मिट जाना ही अद्वैत है। वेदांत दर्शन के सारतत्व को गीता में भगवान की वाणी के तौर पर रखा गया और वहां भी योग को बहुत ही रोचक और सहज अंदाज में समझाया गया। कालांतर में महान ऋषि पतंजलि ने योग को सूत्रों में ढाला और समझाने की कोशिश की। फिर इन ग्रंथों को इस तरह से लिखा गया ताकि किसी भी काल परिस्थिती का व्यक्ति इसके सार तत्व को समझ पाए। संकेतों और कथाओं के आधार पर लिखे जाने वाले इन ग्रंथों के जानकार भी बनते चले गए और उन्हें समाज में विशेष सम्मान भी दिया गया। ये परंपरा बहुत समय तक चलती रही लेकिन फिर विदेशियों की कुदृष्टि और एक के बाद एक हुए हमलों ने एक जबरदस्त हलचल पैदा कर दी। अतीत के योगियों ने पहले भी इस बात को कह दिया था कि इस तरह कि स्थितियां पहले भी बनती रही हैं और आगे भी बनती रहेंगी। हमारी संस्कृति की जड़ वेदांत को नहीं छोड़ेंगे तो हम हजार बार गिरकर फिर खड़े हो जाएंगे। गिरावट का ये दौर आया और स्वाधीनता के बाद से हम लड़खड़ाते लड़खड़ाते खड़े हो रहे हैं। हमारे मूल तत्व वेदांत का किसी धर्म या मजहब से कोई लेना देना नहीं बल्कि इन्हें समझ लेने वालों के नाम पर तो लोगों ने खुद ही धर्म बना डाले।
योगी का कोई धर्म मजहब नहीं होता और न ही योग का। योग धर्म का मूल है। जब आप के भीतर वासनाओं का उठना बंद हो जाता है, आपके विचारों का कोलाहल थम जाता है आप किसी से प्रेम या घृणा नहीं करते हैं वरन हर परिस्थिति में आप सम रहते हैं तो ये योग की स्थिति होती है। हमारे वेदांत दर्शन और गीता को पढ़ेंगे तो आप जान जाएंगे कि इन्ही बातों को समझाने के लिए ये प्रयास किए गए थे। कुछ विद्वानों ने मोहवश अपने बच्चों तक ही इसे सीमित रखने का प्रयास किया। उन्होंने इसे अपनी बपौति बनाने की कोशिश की और अपने ही बच्चों को इसकी शिक्षा दी। ये ज्ञान को अपने पास जकड़कर रखने की राजनीति की शुरूआत थी। जैसे ही ज्ञान में मिलावट होती है वैसे ही उसका ह्रास होने लगता है। हमारे बेशकीमती योग के साथ भी यही हुआ। योग की प्राप्ति जिन्हें नहीं हुई थी उन्होंने भी गलत सलत योग सिखाना शुरू कर दिया। जो खुद भ्रमित है वो कैसे किसी को राह दिखा सकता है। हुआ भी यही धीरे धीरे योग धर्म विशेष का बन गया, फिर कुछ लोगों ने खुद को इससे दूर करना शुरू कर दिया तो कुछ लोगों ने बिना इसे जाने समझे इसे अपने अहं से जोड़ लिया।
आज एक प्रयास हो रहा है लेकिन यहां समत्व को प्राप्त कितने योगी आपको समाज का नेतृत्व करते दिखते हैं? स्वामी शरणानंद जी के शब्दों में हाथ पांव मोड़कर शारीरिक जिमानास्टिक का नाम योग नहीं है। योग तो मन में उठने वाली विचारों की तरंगों के पूरी तरह रुक जाने और एक ईश्वर में या ओंकार में स्थित होने का नाम है। जो प्रश्न करते हैं ऐसा कैसे हो सकता है? उन्हीं लोगों के लिए वेदांत दर्शन, उपनिषद और फिर महान पुस्तक गीता को लिखा गया, लेकिन हमने इन्हें कपड़े में लपेटकर कर मंदिर में रख दिया और अपने धर्म की बपौति बना लिया। जो इनका विरोध कर रहे हैं वे तो मूर्ख हैं ही जो इन्हें अपना बताकर फूले नहीं समां रहे हैं वे भी मूर्ख ही हैं। योग हर मानव मात्र के उत्थान के लिए है, लेकिन राजनीति और व्यवसाय के हावी होने की वजह से इसका बहुत ही नाटकीय रूप हमारे सामने आ रहा है। जब बुद्ध निकले थे तो किसी यूएन का ठप्पा उन्हें नहीं लगाना पड़ा था और योग को उन्होंने सिर्फ देश ही नहीं विदेशों तक पहुंचा दिया था। जिन्हें योग और बुद्ध के संबंध को समझना है उन्हें भी वेदांत का रुख करना होगा। बुद्ध ने उस समय सही ज्ञान के नाम पर मिलावट करने वाले लोगों से बचने के लिए कहा था। आज भी कमोबेश वैसी ही स्थिती है योग तो आवश्यक है लेकिन उसके नाम पर यदि भोग में ही लगे हुए हैं तब तो बेड़ा पार लगना मुश्किल है।
योगानंद परमहंस
योग के आवश्यक और अनावश्यक होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। असली प्रश्न है क्या योग पढ़ाने वाले खुद योग समझ पाए हैं? यदि नहीं तो क्या खाक योग का प्रचार होगा और क्या खाक योग की महिमा दुनिया गाएगा। राजनीति हमेशा योग के सामने बौनी रही है। राजपाट छोड़ने वाले बुद्ध को राजनेताओं की जरूरत नहीं पड़ी बल्कि अशोक, हर्षवर्धन और ऐसे जाने कितने राजाओँ के बुद्ध के न होने के बावजूद, उनकी शरण में जाना पड़ा। हमें दुनिया जानती भी हमारी इसी खासियत की वजह से है। रोमन, ग्रीक और जाने ऐसी कितनी पुरातन सभ्यताएं अब कहानियों में ही मिलती हैं लेकिन हम आज भी हैं। बेशक टूटा फूटा समझते हैं लेकिन कुछ कुछ बातें तो जानते ही हैं। ऐसा भी नहीं है कि योग को जानने वाले बचे ही नहीं हैं लेकिन पाश्चात्य देशों से हमने जो व्यवसाय की तकनीक सीखी है उसमें चकाचौंध के जरिए लोगों को आसानी से भ्रमित किया जा सकता है।
हम सबकुछ नकल करने लगे हैं। हमारा रहन सहन, सुविधाजनक जीवन, तकनीक तक तो बात ठीक है लेकिन इनके साथ ही जब वेदांत के संस्कारों पर हमला होने लगा तो हालात खराब होने लगे। एक पीढ़ी के खत्म होने में ज्यादा समय नहीं लगता है। छोटे से जीवन में कब हम जवान और फिर बूढ़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता। नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से कुछ बातें सीखती है तो उस दौर में उपलब्ध वस्तुओं, परिस्थितियों और तकनीक के आधार पर अपनी बुद्धि का विकास करती है। सनातन परंपरा में पीढ़ी दर पीढ़ी योग को जीवन के अनिवार्य अंग के रूप में हस्तांतरित किया जाता था। आज योग के नाम पर भी भोग की ही दुकानें देखने को मिलती है। योग को कारपोरेट रंग देकर इसे दुकान पर बिकने वाली वस्तु बना दिया गया है। जो लोग आज योग के बहुत ही सतही रूप को अपनाते भी है तो वो भी सुंदर और सुडौल दिखने के लिए। दरअसल योग का मतलब प्रबल इच्छाशक्ति के साथ वासनाओं और चित्त की वृत्तियों का पूर्णतः शमन बताया गया है। ये उसी व्यक्ति के लिए संभव हो सकता है जिसका शरीर भी स्वस्थ हो। स्वस्थ शरीर योगी के लिए एक साधन मात्र होता है जबकि आज तो योग का मकसद ही जैसे स्वस्थ शरीर बनाना भर रह गया है। योग को समझेंगे तभी योग को समझा पाएंगे। ये विवेकानंद के युग में भी असंभव कार्य लगता था। शंकराचार्य के समय तो ये और भी दुष्कर काम था लेकिन बिना किसी प्रचार प्रसार और तकनीक का इस्तेमाल किए उन्होंने इसकी हानी को खत्म करते हुए इसकी पुनर्स्थापना की। हर युग में इसी तरह योग सिखाने के तरीकों में मिलावट हो जाती है। इसी तरह सिखाने वालों की गुणवत्ता भी गिरती जाती है।
स्वामी चिन्मयानंद
फिर क्या किसी अवतार का इंतजार करना चाहिए? स्वामी विवेकानंद और उनकी तरह कई अन्य योगी ये बात बहुत स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि हम सब में वही असीम संभावनाएं हैं जो बुद्ध में या शंकराचार्य में थी। ठीक इसी तर्ज पर स्वामी शरणानंद का विचार था कि हम सभी को वो महान जीवन मिल सकता है जो कभी भी किसी भी महापुरूष को मिला है। अपना चेहरा चमकाना या भक्तों की भीड़ जमा कर लेना योग नहीं है ये तो भोग की ही पराकाष्ठा है जिसका अंत किसी अन्य भोग की तरह कष्ट में ही होता है। आज के दौर में भ कुछ संतों ने सराहनीय काम किया है और बहुत हद तक वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाया है लेकिन योग का राजनीति से कोई मेल नहीं है। इसे आम जन से जोड़ने के लिए प्रचार प्रसार से ज्यादा उस समर्पण की जरूरत होगी जो बीते समय के तमाम योगियो ने दिखाया है। वाकई भारत में विश्वगुरू बनने की क्षमता है क्यूंकि पाश्चात्य दर्शन में वासनाओं के शमन और विचारों के कोलाहल पर पूर्ण विराम जैसी योग की स्थितियों पर कभी विचार ही नहीं हुआ। पाश्चात्य संस्कृति भोग को बढ़ाने से पल्लवित पुष्पित हुई है। हम उनकी नकल करेंगे तो उन्हें बचाने वाला तो कोई नहीं बचेगा साथ ही हम खुद को भी बर्बाद कर लेंगे। तकनीक और विज्ञान के दौर में मानव सभ्यता के विकास के लिए उपयोगी बातों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण योग ही है। हम एटम से एनर्जी बनाते हैं या बम का विवेक योग देता है। ये विवेक और प्रज्ञा का जागरण सिर्फ योग से संभव है। योग भारत की जड़ों में है और इस विरोध या समर्थन की कोई आवश्यकता नहीं। ये सच है कि इसे लेकर यदि पाखंड किया जाएगा तो इसके प्रति लोगों का सम्मान कम होगा और इसे सही तरीके से रखा जाएगा तो किसी जद्दोजहद की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।



मंगलवार, 30 जून 2015

स्वामी चिन्मयानन्द और सत्य की खोज

स्वामी चिन्मयानन्द
(8 मई 1916 - 3 अगस्त 1993)

स्वामी चिन्मयानन्द जी का जन्म केरल में एक संभ्रांत परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम बालकृष्ण था। उनके पिता एक न्यायधीश थे। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में सन 1940 में प्रवेश लिया। लखनऊ विश्वविद्यालय की पढ़ाई समाप्त करने के बाद बालकृष्ण ने पत्रकारिता का कार्य प्रारम्भ किया। उनके लेख मि. ट्रैम्प के छद्म नाम से प्रकाशित हुए। इन लेखों मे समाज के गरीब और उपेक्षित व्यक्तियों का चित्रण था। एक तरह से ये उस समय के सरकार और धनी पुरुषों का उपहास था। इसी समय वे स्वामी शिवानंद से प्रभावित हुए और उनसे संन्यास की दीक्षा ले ली।  वेदांत दर्शन को जन जन तक पहुंचाना स्वामी चिन्मयानन्द ने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी उन्हें वेदान्त दर्शन के एक महान प्रवक्ता रूप में स्वीकार किया गया। आध्यात्म को तर्कसम्मत बनाकर उसे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण अंग के रूप में उन्होंने अपने शिष्यों को दिया। उनका मानना था कि दुनिया की तमाम पुरानी सभ्यताएं इतिहास का हिस्सा बन गईं और किताबों तक सिमट कर रह गई लेकिन सनातन परंपरा के मूल तत्व वेदांत की वजह से वैदिक धर्म को कोई नष्ट नहीं कर पाया। गीत ज्ञान-यज्ञ के जरिए उन्होंने वेदांत के सार को अपने शिष्यों के समक्ष रखा। इसी लक्ष्य को आगे बढ़ाते हुए 1953 में  चिन्मय मिशन की स्थापना की गई, जो आज भी देश विदेश में सक्रिय रूप से उनके विचारों का प्रचार कर रहा है। वैदिक परंपरा को समझाने के लिए उन्होंने युवाओं को प्रेरित किया और इन युवाओं को तैयार कर देश भर में इसके प्रचार के लिए लगाया। वे मानते थे कि वेदांत को न समझकर सिर्फ कर्मकांडों में फंसे रहने की वजह से हम लगातार पिछड़ते हुए दिखाई देते हैं। अपने मिशन के तहत उन्होंने हजारों स्वाध्याय मंडल स्थापित किये। बहुत से सामाजिक सेवा के कार्य जैसे विद्यालय, अस्पताल आदि की भी उन्होंने शुरूआत की। उन्होंने उपनिषद्, गीता और आदि शंकराचार्य के 35 से अधिक ग्रंथों पर व्याख्यायें लिखीं। स्वामी चिन्मयानन्द जी ने अपना भौतिक शरीर 3 अगस्त 1993 ई. को अमेरिका के सेन डियागो नगर में त्याग दिया।

स्वामी चिन्मयानंद और सत्य की खोज

अपने जीवन के लक्ष्य को क्षूद्र दायरों में नहीं बांधना चाहिए। छोटे लक्ष्य की प्राप्ति होने के बाद जीवन समाप्त हो जाता है। जैसे शादी ब्याह में घर की महिलाएं बहुत मेहनत मशक्कत करती हैं और जब बेटी विदा हो जाती है तो थक कर चूर हो जाती हैं और इतनी बुरी हालत में होती हैं कि खाना तक पड़ोसी आकर खिलाते हैं। इस थकान की वजह है लक्ष्य का खत्म हो जाना, उत्साह का खत्म हो जाना। जीवन में ऐसे लक्ष्य को स्थापित करें जिसे पाया ही न जा सके। लक्ष्य प्राप्ति जीवन नहीं है, लक्ष्य प्राप्ति के लिए सतत प्रयत्नशील रहना जीवन है। जीवन के इस उच्चतम लक्ष्य को समझाते हुए स्वामी चिन्मयानंद ने तर्कसम्मत तरीके से सत्य की खोज को समझाया। उन्होंने ने शरीर, मन और बुद्धि को संचालित करने वाली वासनाओं से मुक्त होने पर जोर दिया। ये तब तक संभव नही है जब हम अपने भूतकाल के अनुभवों और उनसे बनने वाली अपनी इच्छाओं से पूर्णतः मुक्त नहीं हो जाते हैं। वेदांत हमें पहले ही इस सत्य को भली भांति समझा चुके हैं। वेदांत के सार गीता में इस सत्य की प्राप्ति के लिए इंद्रिय संयम के महत्व और उसके लिए किए जाने वाले अभ्यास को भी भगवान कृष्ण की वाणी में समझाया गया है। सत्य दुनिया के हर व्यक्ति के लिए एक ही है। काल, परिस्थिति की वजह से जो बाह्य विभाजन दिखते हैं उससे मानव मात्र के मूल सत्य का कोई लेना देना नहीं है, वो हम सब के लिए एक ही है। जैसे विभिन्न देशों में रहने वालों का अपनी परिस्थिति के आधार पर रहन सहन और खान पान अलग अलग होता है, ठीक वैसे ही सत्य की प्राप्ति के विभिन्न तरीकों को ईजाद कर लिया गया। जिसे जो बेहतर लगता है उसे अपनाकर उस सत्य की प्राप्ति करनी चाहिए जिसे हम कभी न समाप्त होने वाला आनंद कहते हैं। हम जितना ही सुख प्राप्ति के लिए भागते हैं उतना ही आनंद से दूर होते जाते हैं। इस सतत परिवर्तन शील संसार में जब सब कुछ तेजी से बदल रहा है तो आनंद कैसे स्थायी रह सकता है? इस प्रश्न का जवाब बहुत सुंदर ढंग से स्वामीजी ने अपने शिष्यों के समक्ष रखा। परिवर्तन शील संसार को हम अपने शरीर, मन और बुद्धि से देखते और समझते हैं। जिस तरह कार को चलाने के लिए पैट्रोल और बल्व को चलाने के लिए बिजली की आवश्यकता पड़ती है, ठीक वैसे ही हमारे शरीर, मन और बुद्धि को वासनाएं चलाती हैं। जब तक वासनाएं हमें चला रही हैं हम कभी उस सत्य को नही पा पाएंगे जिसे हम ईश्वर कहते हैं। सत्य या ईश्वर की प्राप्ति के लिए आपका स्वयं को जानना और स्वाधीन होना आवश्यक है। वासनाओं की गुलामी से ऊपर उठते ही आप परम स्वाधीनता का अनुभव करते हैं। ऐसे स्वाधीन जीवन को ही चैतन्य जीवन कहा जाता है। इस चैतन्यता के साथ ही हम स्वयं को जानते हैं और शरीर, मन और बुद्धि हमारे अधीन होते हैं न कि हम उनके अधीन। हमारे अनुभव और इच्छाएं ही वासना के मूल में हैं यदि विचारों को विराम देकर हम इच्छाओं और वासनाओं को काबू कर लें तो हम सत्य का अनुभव कर पाएंगे। वेदांत किसी धर्म विशेष के लिए नहीं है। जब हम जड़ मान्यताओं से ऊपर उठकर इनके मूल तत्व को समझते हैं तो हम जान जाते हैं कि कभी न खत्म होने वाले अनंत आनंद की कुंजी इसी में छिपी हुई है।

सोमवार, 29 जून 2015

आचार्य श्रीराम शर्मा और सत्य की खोज

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य 
(२० सितम्बर १९११ - ०२ जून १९९०)


संपूर्ण जगत के कल्याण के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वाले मनीषियों में आचार्य श्रीराम शर्मा का भी नाम शुमार है। सतत कर्मयोग और समर्पण को ही वे सत्य की खोज मानते थे। बहुत छोटी उम्र से ही वे समाज में इंसान-इंसान के बीच भेद को लेकर व्यथित रहते थे। कम उम्र में ही आध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि हो गई थी। पं. मदन मोहन मालवीय ने उन्हें यज्ञोपवित और गायत्री मंत्र से दीक्षित किया था जिसके बाद उन्होंने अपने जीवन को इस शक्तिशाली मंत्र के अनुसंधान में समर्पित कर दिया। एक संपन्न परिवार में जन्में आचार्य जी आध्यात्मिक संपदा को ही असली संपत्ति मानते थे। अपने शिष्यों को उन्होंने आध्यात्म की शक्ति के बारे में बताते हुए कई बार अपना उदाहरण देते हुए बताया कि यदि अपने परिवार और अपनी संपदा तक ही उनका जीवन सीमित रहता तो कभी गायत्री परिवार जैसा बड़ा लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता। आचार्य श्री प्रज्ञा जागरण को ही आज का योग मानते थे। उनका कहना था भौतिक जगत के विकास के साथ-साथ प्रदूषण और अविवेक का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। प्रदूषण सिर्फ बाहर ही नहीं है, हमारे विचार और संस्कार भी दूषित होते जा रहे हैं। ऐसे समय में आध्यात्मिक जागरण की आवश्यकता अधिक है। प्रज्ञा जागरण के साथ ही ईश्वर स्वयं सत्य की खोज का मार्ग प्रशस्त करन लगते हैं। वेदों और प्राचीन ग्रंथों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से किए गए उनके टीका बहुत लोकप्रिय हुए। उनका मानना था कि सिर्फ किताबों को पढ़ने या व्याख्यानों को सुनने भर से आध्यात्मिक जागरण नहीं होता है। वे हर एक से अपनी शक्ति को पहचानने और जीवन को महत्वपूर्ण कार्यों में लगाने पर जोर देते रहे।


ब्राह्मण परिवार में जन्में आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपनी सत्य की खोज में जाना कि कोई ब्राह्मण पैदा नहीं होता उसे ब्राह्मण बनना होता है। उनकी इस बात का जाति से कोई लेना देना नहीं था। वेदों आदि में ब्राह्मण शब्द की महिमा को समझाते हुए वे ये समझाना चाहते थे कि ब्राह्मण वही है जो सत्य की खोज कर लेता है। अपनी क्षूद्र वासानओं और अपने मोह से बनाए संबंधों के लिए जीवन बिता देने को वे एक महत्वपूर्ण और कीमती जीवन को बर्बाद कर देने वाला मानते थे। आजीवन कर्मयोगी रहे आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने शिष्यों को भी एक ही सिद्धांत कि सतत शिक्षा दी। बोओ और काटो। वे मानते थे कि आध्यात्म का स्वांग करने या झूठे कर्मकांडों से सत्य की प्राप्ति नहीं होती है। सत्य को प्राप्त करने के लिए अपने कर्मों के बीज बोने पड़ते हैं। समय, श्रम, ज्ञान और संपदा के बीज बोने पर उनका जोर था। हमें मिली एक एक श्वांस महत्वपूर्ण कार्यों को करने के लिए है। अपने प्रत्येक पल का सदुपयोग ही समय के बीज का सही रोपण है। वे सोने, खाने एवं अन्य नित्यकर्मों में लगने वाले अपने समय के लिए भी क्षमा मांगते हुए कहते थे कि ये समय मैंने अपने लिए खर्च किया जो मुझे समय की बर्बादी लगती है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मानवमात्र के कल्याण केकी  लिए उन्होंने अपने जीवन को किस तरह समर्पित कर रखा था। अखंड ज्योति जैसी समाज सुधार की पत्रिका या उनके द्वारा किया गया वेदों का भाष्य हो, इस सबके लिए उन्होंने कठिन परिश्रम किया। अपने जीवन के अंतिम समय तक वे देश भर का भ्रमण करते रहे, शिष्यों को व्याख्यान देते रहे। ज्ञान का बीज तभी रोपा जा सकता है जब बुद्धि पर हमारा नियंत्रण हो। अभीष्ट कार्यों सिद्धि और अनिष्ट कार्यों से दूरी ही बुद्धि की शक्ति है। मजबूत इच्छाशक्ति इस ज्ञान का पैमाना है। जिनमें जनकल्याण की भावना है, आत्मशोधन का सपना है वे ही बुद्धिमान है। आचार्य जी के पास पिता की संपत्ति थी लेकिन उन्होंने संपत्ति का मोह न कर अपनी संपदा का बीज मानव कल्याण के लिए बो दिया। कर्मयोग से सत्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने एक सरह सिद्धांत अपने शिष्यों के समक्ष रखा। वे कहते थे ज्वार, बाजरे या गेंहू का एक बीज बोते हैं तो सैंकड़ों बीज मिलते हैं। इसी तरह समय, श्रम, बुद्धि और संपदा के बीज को बोने से सैकड़ों बीज फल रूप मिलते हैं। अपने जीवन को आदर्श के रूप में बोने से आप करोड़ों जीवन कैसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर कर सकते हैं का भी आचार्य जी एक बड़ा उदाहरण रहे हैं। सत्य की खोज करने वालों के लिए उनका निर्देश बहुत स्पष्ट था, आप के जीवन में यदि क्षूद्र वासानाएं और इच्छाएं हैं तो ये जीवन व्यर्थ ही गंवा रहे हैं। सत्य पाना है तो समर्पण का भाव होना चाहिए। विश्व और मानव मात्र में ही ईश्वर के विराट स्वरूप को देखकर समर्पण करना ही सत्य की खोज का मार्ग है। आध्यात्म के पथ में असफलता का प्रश्न ही नहीं उठता है और आचार्य जी के जीवन से भी ये स्पष्ट हो जाता है। वे प्रत्येक श्वांस के साथ जीवन के लक्ष्यों को उच्चतर स्तर पर ले जाने पर जोर देते थे। जिस तरह कच्ची धातु को तपाकर उसमें से धातु को निकाला जाता है ठीक उसी तरह से तप से मन और विचारों को भी शुद्ध किया जाता है। आतंरिक स्वच्छता ही सत्य की खोज के लिए एक उपजाऊ भूमि देते है। जब प्रज्ञा जागृत होती है और आतंरिक भूमि उर्वरा होती है तो सत्य की खोज सहजता से हो जाती है। जल, अक्षत, धूप, फूल, नैवेद्य को वे दयालू प्रवृत्ति, अर्जित धन का मानव कल्याम में सदुपयोग, चिंतन और कर्म की सुगंध, मन की कोमलता और व्यवहार और वाणी की मिठास के रूप में निरूपित करते थे। वे मानते थे कि इस पंचोपचार से आज की देवी प्रज्ञा का पूजन ही सत्य की खोज है।